अमेरिका का ऊर्जा विभाग अपने स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve) से **4 करोड़** बैरल कच्चा तेल रिलीज कर रहा है। भंडार **1982** के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति और भारतीय ऑयल रिफाइनर्स पर असर पड़ सकता है।
अमेरिका का ऊर्जा विभाग (Department of Energy) वैश्विक सप्लाई चैन की अस्थिरता को थामने के लिए एक बड़े कदम के तहत 4 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल जारी कर रहा है। मिडिल ईस्ट और यूक्रेन में जारी तनाव के कारण सप्लाई में आ रही दिक्कतों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। वर्तमान में अमेरिकी स्टॉक 28.4 करोड़ बैरल से भी नीचे गिर गए हैं, जो पिछले 42 वर्षों में सबसे कम है।
ग्लोबल मार्केट और लोन मॉडल
इस कदम को एक 'लोन' के रूप में तैयार किया गया है। एनर्जी कंपनियों को अभी क्रूड दिया जाएगा, जिसे उन्हें 2028 के अंत तक वापस करना होगा। साथ ही, उन्हें 24% तक का प्रीमियम भी देना होगा। हालांकि, जून में पिछली कोशिश के दौरान प्राइवेट सेक्टर का रिस्पांस काफी ठंडा रहा था, जहाँ सिर्फ 5 लाख बैरल की ही बोली लग पाई थी। ऐसे में इस बार का रिस्पांस मार्केट के लिए बड़ा संकेत होगा।
कानूनी सीमा और खतरा
प्रशासन के सामने अब एक बड़ी कानूनी चुनौती है। यदि रिजर्व 25.24 करोड़ बैरल से नीचे गिरते हैं, तो राष्ट्रपति के पास इमरजेंसी के बिना मार्केट कंट्रोल के लिए तेल बेचने का अधिकार नहीं रहेगा। यह सीमा सरकारी हस्तक्षेप को काफी सीमित कर देती है।
भारतीय निवेशकों पर क्या असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता है, इसलिए क्रूड की कीमतों में हलचल का सीधा असर Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है। यदि अमेरिका का यह प्लान सफल होता है और वैश्विक स्तर पर क्रूड की कीमतें स्टेबल रहती हैं, तो इन कंपनियों के मार्जिन में सुधार देखने को मिल सकता है। लेकिन अगर बोली प्रक्रिया विफल रहती है, तो क्रूड की कीमतें हाई रह सकती हैं, जो भारतीय रिफाइनर्स की कॉस्टिंग बढ़ा देगा। निवेशकों की नजर अब 6 अक्टूबर को होने वाली बिडिंग प्रक्रिया के नतीजों पर टिकी है।
