अमेरिकी ड्यूटी का तगड़ा झटका, भारतीय सोलर स्टॉक्स गिरे
अमेरिकी वाणिज्य विभाग (U.S. Department of Commerce) ने भारत से आयात होने वाली सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स पर 125.87% की एक भारी शुरुआती काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) लगाने का ऐलान किया है। यह बड़ा कदम कथित तौर पर भारतीय निर्यातकों को मिलने वाली सरकारी सबसिडी को लेकर उठाया गया है, जिसके चलते अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बिगड़ रही थी। इस फैसले की घोषणा 24 फरवरी, 2026 को हुई, और इसका असर तुरंत भारतीय सोलर कंपनियों के शेयरों पर दिखा।
शेयर बाजार में भगदड़
इस बड़े टैक्स की खबर आते ही प्रमुख भारतीय सोलर कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। Waaree Energies के शेयर 15% तक लुढ़क गए, Premier Energies के शेयरों में लगभग 18% की भारी गिरावट आई, वहीं Vikram Solar के शेयर 7.5% से अधिक टूट गए। यह गिरावट निवेशकों की इस चिंता को दर्शाती है कि इस ड्यूटी से कंपनियों के रेवेन्यू और प्रॉफिट पर कितना बुरा असर पड़ सकता है। खासकर वे कंपनियां जो अमेरिकी बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, वे सीधे तौर पर प्रभावित होंगी। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत के सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स का लगभग 95% एक्सपोर्ट अमेरिका को ही जाता है। Waaree Energies, जिसका लगभग 29% एक्सपोर्ट अमेरिका पर निर्भर है, और Vikram Solar, जिसका 16% एक्सपोर्ट अमेरिका को जाता है, इस फैसले से सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। Premier Energies, जिसकी अमेरिका पर एक्सपोर्ट निर्भरता न के बराबर है, पर इसका सीधा असर थोड़ा कम दिख सकता है।
अमेरिका की रणनीति और भारत का बढ़ता एक्सपोर्ट
यह अमेरिकी कदम अपनी घरेलू सोलर मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने और चीन पर निर्भरता कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका विदेशी सबसिडी वाली वस्तुओं को अपने बाजार में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले भी अमेरिका वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया और कंबोडिया जैसे देशों पर ऐसी ही ड्यूटी लगा चुका है। यह कदम भारत के बढ़ते सोलर एक्सपोर्ट का भी नतीजा है, जो 2022 में 8.386 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024 में 79.26 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया था। इसी बढ़त को देखते हुए 'अलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड' ने जांच की मांग की थी, जो इस फैसले की जड़ है।
'विपरीत अनुमानों' का इम्प्लीकेशन और कंपनियों की तैयारी
अमेरिकी वाणिज्य विभाग का यह शुरुआती फैसला 'विपरीत अनुमानों के आधार पर उपलब्ध आंकड़े' (facts available with adverse inferences) पर आधारित है। इसका मतलब है कि जांच प्रक्रिया में कुछ भारतीय कंपनियों की ओर से पूरी जानकारी न दिए जाने की आशंका है। अगर यह तरीका अंतिम फैसले में भी जारी रहता है, तो भविष्य में ड्यूटी और भी ज्यादा बढ़ सकती है या रेट्रोएक्टिव (पिछली तारीख से) लागू हो सकती है, जो कंपनियों के वित्तीय अनुमानों को बड़ा झटका दे सकती है।
हालांकि, कुछ भारतीय कंपनियां इस स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयार दिख रही हैं। Waaree Energies जैसी कंपनियों ने ओमान और अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग में निवेश करके अपनी सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई किया है। यह कदम जोखिमों को कम करने और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने में मददगार होगा। वहीं, Premier Energies ने विदेशी बिक्री में कटौती की है।
बाजार का दबाव, उम्मीदें और भविष्य
अमेरिका में फर्स्ट सोलर (First Solar) और हनवा क्यू सेल्स (Hanwha Q CELLS) जैसी कंपनियां अपने घरेलू उद्योग के संरक्षण के लिए लॉबिंग कर रही हैं, जिससे भारतीय इम्पोर्ट के खिलाफ दबाव बढ़ रहा है। इससे भारत के एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड ग्रोथ मॉडल के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
इस बीच, उद्योग के हितधारक, जिनमें नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया भी शामिल है, भारत और अमेरिका के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता से समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। यदि यह बातचीत सफल होती है, तो इन ड्यूटी को रद्द किया जा सकता है, जिससे बाजार में स्थिरता आ सकती है।
इसके साथ ही, भारत सरकार स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) से उत्पादों को घरेलू बाजार में बेचने की सुविधा देकर कंपनियों को वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है।
Waaree Energies, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹77.9 खरब है और पी/ई रेशियो लगभग 22.9 है, अपनी घरेलू क्षमता का लाभ उठा रही है। Vikram Solar, जिसका मार्केट कैप करीब ₹67.16 अरब और पी/ई 14.8 है, अपनी मॉड्यूल क्षमता बढ़ा रहा है और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (BESS) में निवेश कर रहा है। Premier Energies, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹33 खरब और पी/ई 24.8 है, घरेलू मांग और तकनीकी विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। 6 जुलाई, 2026 को आने वाला अंतिम फैसला इस पूरे मामले के दीर्घकालिक प्रभाव को स्पष्ट करेगा, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि एक्सपोर्ट में संभावित रुकावटों से निपटने के लिए डाइवर्सिफिकेशन और मजबूत घरेलू मांग कितनी अहम है।