अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स ने भारतीय सोलर इम्पोर्ट पर **120%** से ज्यादा एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दी है। **4 दिसंबर** से लागू होने वाले नए मिनिमम प्राइस रूल्स और **14 अक्टूबर, 2026** को होने वाले USITC के फैसले के बाद भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए चुनौतियां और भी गहरा गई हैं।
अमेरिकी सरकार के इस कड़े कदम से भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरर्स के लिए बड़ा संकट पैदा हो गया है। सितंबर 2026 के इन नए रेगुलेटरी बदलावों के तहत एंटी-डंपिंग ड्यूटी 123.04% और काउंटरवेलिंग ड्यूटी 126.09% तक पहुंच गई है। इससे भारतीय सोलर पैनल और सेल्स की लागत अमेरिका में बहुत ज्यादा बढ़ गई है, जिससे भारतीय कंपनियों की ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस पर सीधा असर पड़ रहा है।
नई प्राइस पॉलिसी का असर
अमेरिका ने 'ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट' की धारा 232 का इस्तेमाल करते हुए सोलर कंपोनेंट्स के लिए मिनिमम इम्पोर्ट प्राइस तय कर दिए हैं। 4 दिसंबर, 2026 से सोलर सेल्स के लिए $0.22 प्रति वॉट और मॉड्यूल्स के लिए $0.38 प्रति वॉट का फ्लोर प्राइस लागू होगा। यह नियम अमेरिकी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बचाने के लिए लाया गया है, जिससे विदेशी कंपनियों की लागत-दक्षता (Cost Efficiency) का महत्व खत्म हो जाएगा।
कंपनियों के लिए क्या हैं विकल्प?
Waaree Energies और Premier Energies जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में अपनी डिमांड को देखते हुए काफी कैपेसिटी बढ़ाई थी। अब इन नए टैरिफ्स के कारण कंपनियों के मार्जिन पर गहरा दबाव देखने को मिल सकता है। कई कंपनियां अब अमेरिका में ही मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने पर विचार कर रही हैं, लेकिन अमेरिका में लेबर और एनर्जी की लागत ज्यादा होने से कैपिटल एक्सपेंडिचर का बोझ बढ़ना तय है।
निवेशकों की नजरें अब 14 अक्टूबर, 2026 को आने वाले USITC के 'फाइनल इंजरी डिटरमिनेशन' पर टिकी हैं। यह फैसला तय करेगा कि इन ट्रेड बैरियर्स को कितनी सख्ती से लागू किया जाएगा। तब तक बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और सप्लायर चेन में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
