US-सऊदी अरब के बीच परमाणु समझौता पक्का, अब अमेरिकी संसद की बारी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
US-सऊदी अरब के बीच परमाणु समझौता पक्का, अब अमेरिकी संसद की बारी

अमेरिका और सऊदी अरब ने एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका मकसद सऊदी अरब को बिजली परियोजनाओं के लिए अमेरिकी तकनीक मुहैया कराना है। हालांकि, यह डील अमेरिकी संसद (Congress) में समीक्षा के दायरे में है, जहां परमाणु प्रसार (nuclear proliferation) के जोखिमों को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।

Detailed Coverage

परमाणु ऊर्जा समझौते पर मुहर

अमेरिका और सऊदी अरब ने एक महत्वपूर्ण नागरिक परमाणु सहयोग समझौते (civil nuclear cooperation agreement) पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसे 123 समझौते के तौर पर भी जाना जाता है। इस डील के तहत, सऊदी अरब अपनी घरेलू बिजली परियोजनाओं के लिए अमेरिकी परमाणु ऊर्जा तकनीक (nuclear energy technology) का इस्तेमाल कर सकेगा। इस समझौते पर अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट (Chris Wright) और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान (Prince Abdulaziz bin Salman) ने हस्ताक्षर किए।

अमेरिका के लिए फायदे और सामरिक साझेदारी

अमेरिकी सरकार के लिए इस समझौते का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी परमाणु तकनीक के निर्यात (nuclear technology exports) को बढ़ाना है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग (US Department of Energy) का कहना है कि यह समझौता अमेरिकी परमाणु उद्योग में नौकरियों के अवसर पैदा करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए है। इसके अलावा, यह डील वाशिंगटन और रियाद के बीच लंबे समय से चली आ रही सामरिक साझेदारी (strategic partnership) को और मजबूत करेगी। सऊदी अरब के लिए, यह ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने और जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) पर निर्भरता कम करने की बड़ी योजना का हिस्सा है।

परमाणु प्रसार और सुरक्षा पर बहस

इस डील ने सुरक्षा और निगरानी के मानकों को लेकर बहस छेड़ दी है। साल 2009 में अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच हुए एक ऐसे ही परमाणु समझौते में यह शर्त थी कि UAE खुद यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) और खर्च किए गए ईंधन को फिर से प्रोसेस (spent fuel reprocessing) करने से परहेज करेगा। लेकिन सऊदी अरब के साथ हुए इस नए समझौते में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। फाइनल शर्तों के अनुसार, सऊदी अरब यूरेनियम संवर्धन और रीप्रोसेसिंग की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जो परमाणु उद्योग की बेहद संवेदनशील गतिविधियां हैं।

कुछ आलोचकों ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा गहन निरीक्षण (enhanced inspection measures) के लिए अतिरिक्त प्रोटोकॉल (Additional Protocol) के न होने पर भी सवाल उठाए हैं, जिसकी मांग अमेरिका ने बातचीत के शुरुआती दौर में की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरेनियम संवर्धित करने की क्षमता सैद्धांतिक रूप से इसे सैन्य अनुप्रयोगों की ओर मोड़ने का रास्ता खोल सकती है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति

इस क्षेत्र की सुरक्षा की स्थिति को लेकर भी नजरें टिकी हुई हैं। सऊदी नेतृत्व ने पहले मध्य पूर्व में हथियारों की दौड़ (arms race) की संभावना पर टिप्पणी की है, खासकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम (Iran’s nuclear program) के संबंध में। इसके अलावा, रियाद ने पहले यह भी संकेत दिया था कि यदि अमेरिका स्वीकार्य शर्तों पर परमाणु तकनीक के लिए साझेदारी करने को तैयार नहीं होता है, तो वह चीन या रूस जैसे अन्य वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं (global suppliers) से सहयोग लेने के लिए तैयार होगा, जिनके निगरानी नियम अलग हो सकते हैं।

विधायी प्रक्रिया और अगले कदम

यह समझौता अभी पूरी तरह से प्रभावी नहीं हुआ है। अब इसे अमेरिकी संसद (US Congress) में अनिवार्य समीक्षा अवधि से गुजरना होगा। इस दौरान, सांसद गैर-प्रसार सुरक्षा उपायों (nonproliferation safeguards) को लेकर आपत्तियां उठा सकते हैं या और स्पष्टीकरण की मांग कर सकते हैं। हालांकि वर्तमान प्रशासन का कहना है कि यह डील परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act) का पालन करती है, लेकिन कांग्रेस द्वारा किसी भी औपचारिक अस्वीकृति पर राष्ट्रपति को इन चिंताओं को दूर करना होगा। निवेशक और उद्योग विश्लेषक कांग्रेस की समीक्षा प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रखेंगे, क्योंकि अंतिम शर्तें और कोई भी संभावित संशोधन वैश्विक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भविष्य के व्यापार की गतिशीलता को प्रभावित कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.