SHANTI Act से न्यूक्लियर सहयोग को मिली रफ़्तार
नए SHANTI Act 2025 के चलते अमेरिका की कमर्शियल न्यूक्लियर इंडस्ट्री भारत में बड़े विस्तार के लिए तैयार है। इस कानून ने परमाणु दायित्व (Nuclear Liability) से जुड़ी पुरानी समस्याओं को हल कर दिया है, जो पहले दोनों देशों के बीच सहयोग में रोड़ा बन रही थीं। न्यूक्लियर एनर्जी इंस्टीट्यूट (NEI) के नेतृत्व में एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल फिलहाल भारत में नए रिएक्टर निर्माण के लिए पार्टनरशिप पर चर्चा करने आया है। इसका मकसद अमेरिका के न्यूक्लियर सेक्टर की बढ़ती क्षमताओं का फायदा उठाना है, जिसमें अब पारंपरिक लाइट-वॉटर रिएक्टर्स से कहीं ज़्यादा शामिल है। NEI की प्रेसिडेंट और सीईओ मारिया कोर्सनिक के अनुसार, SHANTI Act ने अमेरिका-भारत न्यूक्लियर संबंधों को काफी बदल दिया है, जिससे क्लीन एनर्जी और महत्वपूर्ण तकनीकों पर मिलकर काम करने के लिए बेहतर माहौल बना है।
एडवांस्ड रिएक्टर्स और भारत की एनर्जी ज़रूरतें
कोर्सनिक ने अमेरिका के न्यूक्लियर इंडस्ट्री में हो रहे विभिन्न नवाचारों, जैसे एडवांस्ड, हाई-टेंप्रेचर गैस और मोल्टेन साल्ट रिएक्टर्स, पर प्रकाश डाला। अमेरिकी कंपनियां भारत की विशिष्ट ऊर्जा मांगों और रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हर आकार के रिएक्टर - बड़े, मध्यम और छोटे - की पेशकश के लिए तैयार हैं। यह 2006 की NEI की यात्रा जैसी पिछली चर्चाओं से एक बड़ा बदलाव है, जिसमें मुख्य रूप से बड़े रिएक्टर्स पर ध्यान केंद्रित किया गया था। वर्तमान मिशन का उद्देश्य अमेरिकी तकनीकी प्रगति को भारत की क्लीन और भरोसेमंद ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकता से मिलाना है, जो न्यूक्लियर सेक्टर के लिए एक 'नए युग' का संकेत देता है।
रेगुलेशन और कॉम्पिटिशन से निपटना
जहां SHANTI Act लायबिलिटी के मुद्दों को सुलझाता है, वहीं इन प्रोजेक्ट्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां भारत की अपनी रेगुलेटरी प्रणाली (Regulatory System) और प्रतिस्पर्धी बाज़ार (Competitive Market) को कितनी अच्छी तरह से नेविगेट करती हैं। एडवांस्ड रिएक्टर क्षेत्र की प्रमुख अमेरिकी कंपनियां, जैसे Westinghouse Electric Company और GE Hitachi Nuclear Energy, को भारतीय कंपनियों और अन्य अंतर्राष्ट्रीय सप्लायर्स से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इन पार्टनरशिप की लंबी अवधि की सफलता अमेरिका के रिएक्टर डिजाइनों की लागत की तुलना अन्य ऊर्जा विकल्पों से और भारत अपनी न्यूक्लियर पावर क्षमता का कितनी तेज़ी से विस्तार करता है, इस पर भी निर्भर करेगी। न्यूक्लियर एनर्जी में ग्लोबल ट्रेंड्स, जिसमें ग्रिड स्टेबिलिटी और रिमोट पावर के लिए स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) में बढ़ती रुचि शामिल है, भविष्य की पार्टनरशिप को भी आकार दे सकती हैं।
बाज़ार की संभावना और आगे के कदम
तत्काल प्राथमिकता ऐसे सहयोगात्मक समझौते स्थापित करना है जो वास्तविक परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकें। अमेरिकी उद्योग की सक्रिय भागीदारी भारत की महत्वाकांक्षी क्लीन एनर्जी के लक्ष्यों को देखते हुए, भारत के दीर्घकालिक बाज़ार की क्षमता में विश्वास दिखाती है। इस मिशन के दौरान सफल चर्चाओं से महत्वपूर्ण निवेश और प्रौद्योगिकी साझाकरण हो सकता है, जो दोनों देशों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्यों का समर्थन करेगा।
