अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतों को थामने के लिए सरकार एक्सपोर्ट पर बैन लगाने पर विचार कर रही है। यह फैसला ग्लोबल ऑयल मार्केट और भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और भारतीय ओएमसी (OMC) के मार्जिन पर पड़ सकता है।
अमेरिका में डीजल की कीमतें $6.50 प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। इन आसमान छूती कीमतों को काबू में करने के लिए बाइडेन प्रशासन अब डीजल के एक्सपोर्ट पर रोक लगाने की योजना बना रहा है। इसका मकसद देश के अंदर ट्रकिंग, मैन्युफैक्चरिंग और एग्रीकल्चर सेक्टर के लिए ईंधन की उपलब्धता को बनाए रखना है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह कदम ग्लोबल एनर्जी मार्केट में बड़ी उठापटक पैदा कर सकता है।
रिफाइनरी का 'बॉटलनेक' संकट
अमेरिकी रिफाइनरियों का कामकाज ग्लोबल सप्लाई चेन से गहराई से जुड़ा है। अगर सरकार एक्सपोर्ट बैन लागू करती है, तो रिफाइनरियों को अपना पूरा उत्पादन घरेलू बाजार में ही खपाना होगा। शुरुआत में स्टोरेज भरने के कारण स्थानीय कीमतें गिर सकती हैं, लेकिन एक बार स्टोरेज फुल होने के बाद रिफाइनरियों के सामने बड़ा 'बॉटलनेक' आ जाएगा। मजबूरी में उन्हें अपना कामकाज कम करना पड़ेगा, जिससे गैसोलिन और जेट फ्यूल की ग्लोबल सप्लाई में भारी कमी आ सकती है।
भारतीय एनर्जी सेक्टर पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है। यदि अमेरिका डीजल सप्लाई रोकता है, तो ग्लोबल मार्केट में वोलैटिलिटी (Volatility) बढ़ेगी, जिससे कच्चे तेल की कीमतें उछल सकती हैं। यह भारत के इम्पोर्ट बिल को भारी करेगा और देश में महंगाई का दबाव बढ़ा सकता है।
खासकर Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी कंपनियों के लिए यह स्थिति मुश्किल भरी हो सकती है, क्योंकि ग्लोबल स्तर पर तेल महंगा होने के बावजूद घरेलू कीमतों पर लगाम रहती है। इसका सीधा असर इन कंपनियों के रिफाइनिंग मार्जिन और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर पड़ सकता है। इसके अलावा, Reliance Industries जैसे बड़े एक्सपोर्टर्स पर भी इसका असर दिखना तय है। निवेशकों को अमेरिका की ओर से आने वाले किसी भी आधिकारिक ऐलान पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह सर्दियों के महीनों में एनर्जी प्राइसिंग की दिशा तय करेगा।
