ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के शांति प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया है। स्ट्रैट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में संभावित सैन्य कार्रवाई के संकेतों से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, जिसका सीधा असर भारतीय निवेशकों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
दुनिया के सबसे अहम तेल ट्रांजिट रूट 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' को लेकर मची यह तनातनी ग्लोबल एनर्जी मार्केट के लिए सिरदर्द बन गई है। अमेरिकी अधिकारियों के संकेत साफ हैं कि नवंबर में मिड-टर्म इलेक्शन के बाद सैन्य रणनीतियों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और इसका एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से आता है। किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ेगा। क्रूड ऑयल के दाम बढ़ने से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है और भारतीय रुपये पर दबाव देखने को मिल सकता है। बढ़ती महंगाई का असर कॉरपोरेट मुनाफे और आम आदमी की जेब पर पड़ना तय है।
किन सेक्टरों पर रखें नजर?
भू-राजनीतिक तनाव के दौरान ऑयल-सेंसिटिव सेक्टरों में हलचल तेज हो जाती है:
- OMCs (Indian Oil Corporation, BPCL, HPCL): कच्चे तेल के दाम बढ़ने से इन कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन प्रभावित हो सकते हैं।
- अन्य सेक्टर: एविएशन, पेंट्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियां फ्यूल कॉस्ट पर काफी निर्भर होती हैं, इसलिए इनके मार्जिन पर भी दबाव बन सकता है।
आने वाले हफ्तों में निवेशकों की नजर Brent Crude के भाव और अमेरिका की ओर से आने वाले बयानों पर टिकी रहेगी। बाजार के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय सरकार घरेलू ईंधन की कीमतों को इस वैश्विक दबाव के बीच कैसे मैनेज करती है।
