US में AI डेटा सेंटर्स की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए गैस-फायर्ड पावर प्रोजेक्ट्स का अंबार लग गया है। देश में कुल **378 GW** की क्षमता विकसित की जा रही है, जिसमें **189 GW** सिर्फ डेटा सेंटर्स के लिए समर्पित है।
AI डेटा सेंटर्स का पावर बूस्ट
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी मांग के चलते अमेरिका में गैस-फायर्ड पावर कैपेसिटी का तेजी से विस्तार हो रहा है। अगस्त 2026 तक पाइपलाइन में कुल 378 गीगावाट (GW) की परियोजनाएं हैं। इसमें से 189 GW सीधे तौर पर डेटा सेंटर्स को बिजली देने के लिए प्लान की गई हैं। यह कदम दिखाता है कि बड़ी टेक कंपनियां अब अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए गैस आधारित पावर प्लांट पर दांव लगा रही हैं।
टेक्सास बना हब
इस दौड़ में टेक्सास सबसे आगे निकल चुका है, जहां पाइपलाइन में 122 GW क्षमता के प्रोजेक्ट्स हैं। इसका करीब दो-तिहाई हिस्सा डेटा प्रोसेसिंग सेंटर्स के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
सप्लाई चेन और लागत की चुनौतियां
इस पूरे निर्माण कार्य पर करीब $647 बिलियन से अधिक की लागत आने का अनुमान है। भारी मांग के कारण सप्लाई चेन पर दबाव बन गया है और टर्बाइन के लिए कई सालों का वेटिंग टाइम चल रहा है। डेवलपर्स अब मजबूरन छोटे और कम कुशल 'एयरोडेरिवेटिव यूनिट्स' का उपयोग कर रहे हैं, जो लंबे समय में अधिक उत्सर्जन (Emissions) पैदा कर सकते हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investment Risks)
निवेशकों को यहां संभलकर रहने की जरूरत है:
- Stranded Assets: यदि AI डिमांड में गिरावट आई, तो ये महंगे प्लांट घाटे का सौदा बन सकते हैं।
- बढ़ती महंगाई: हार्डवेयर के लिए मची होड़ ने बिजली की कीमतों को ऊपर धकेल दिया है।
- कंपनियों का रोल: Microsoft, Google और Meta जैसी कंपनियों पर दबाव है कि वे खुद के पावर सॉल्यूशंस ढूंढें ताकि आम जनता के बिजली बिल पर असर न पड़े।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इनमें से कितने प्रोजेक्ट्स हकीकत बनते हैं और कितने रेगुलेटरी अड़चनों के कारण बंद होते हैं।
