Moody’s Ratings की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक अमेरिकी डेटा सेंटर्स की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए **$110 बिलियन** के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। इसके लिए नेचुरल गैस प्रमुख ऊर्जा स्रोत बनकर उभरेगा, लेकिन इससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ बढ़ सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड कंप्यूटिंग के तेजी से बढ़ते चलन ने अमेरिकी एनर्जी सिस्टम पर भारी दबाव डाल दिया है। Moody’s Ratings का कहना है कि साल 2030 तक 45 गीगावाट अतिरिक्त बिजली क्षमता पैदा करने के लिए $110 बिलियन का निवेश करना होगा। अनुमान है कि तब तक डेटा सेंटर्स कुल अमेरिकी बिजली खपत का लगभग 10% हिस्सा यानी 426 टेरावॉट-घंटे इस्तेमाल करेंगे।
नेचुरल गैस पर भरोसा
ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए नेचुरल गैस सबसे भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आई है। नई सप्लाई में से 30 गीगावाट से ज्यादा बिजली गैस आधारित यूनिट्स से आएगी। सोलर और विंड एनर्जी के विपरीत, गैस से लगातार और स्थिर बिजली मिलती है, जो हाई-इंटेंसिटी कंप्यूटिंग के लिए जरूरी है। वहीं, न्यूक्लियर एनर्जी का योगदान इस विस्तार में 5% से भी कम रहने का अनुमान है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
यह मेगा प्रोजेक्ट आर्थिक चुनौतियों के साथ आया है। बिजली का खर्च बढ़ने से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर सालाना $25 बिलियन से $30 बिलियन का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। हालांकि डेटा सेंटर ऑपरेटर्स ने अपने कैंपस के लिए $15 बिलियन निवेश करने की बात कही है, लेकिन बाकी खर्च का भार किसके सिर होगा, इसे लेकर रेगुलेटरी प्रोसेस में घमासान तय है।
निवेशकों के लिए संकेत
निर्माण में देरी और रेगुलेटरी अड़चनें 2030 के लक्ष्य के लिए बड़ा रिस्क हैं। हालांकि, यह स्थिति पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए लॉन्ग-टर्म ग्रोथ का मौका है। भारत समेत दुनिया भर के बाजारों में अब नजर इस बात पर है कि क्या ग्रिड का विस्तार AI सर्वर की रफ्तार से तालमेल बिठा पाएगा या नहीं।
