Renewable Energy Crisis: ग्रिड की कमी से बर्बाद हुई 8,133 GWh बिजली, सरकार का बड़ा एक्शन

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Renewable Energy Crisis: ग्रिड की कमी से बर्बाद हुई 8,133 GWh बिजली, सरकार का बड़ा एक्शन

भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर एक बड़ी चुनौती से जूझ रहा है। ओवर-कैपेसिटी नहीं, बल्कि ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में देरी की वजह से Q1 FY26-27 में **8,133 GWh** सोलर पावर बर्बाद हुई है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने **₹1.86 लाख करोड़** के कॉरिडोर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है।

बिजली की बर्बादी की असली वजह

भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में बिजली उत्पादन की कमी नहीं, बल्कि ट्रांसमिशन लाइनों की भारी किल्लत है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में लगभग 8,133 GWh सोलर बिजली ग्रिड तक न पहुँच पाने के कारण बर्बाद हो गई।

कंपनियों के लिए क्या हैं जोखिम?

वर्तमान में लगभग 21 GW की रिन्यूएबल कैपेसिटी 'टेंपरेरी जनरल नेटवर्क एक्सेस' (T-GNA) पर निर्भर है। स्थायी ग्रिड कनेक्टिविटी न होने के कारण, पीक आवर्स के दौरान इन प्लांट्स को उत्पादन रोकना पड़ता है, जिससे रेवेन्यू में अनिश्चितता बनी रहती है। साथ ही, लगभग 50 GW के प्रोजेक्ट्स राइट ऑफ वे (RoW) और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों के चलते ट्रांसमिशन लाइनों की देरी से प्रभावित हैं।

सरकार का मास्टर प्लान: GEC-III

इन समस्याओं को हल करने के लिए यूनियन कैबिनेट ने Green Energy Corridor Phase-III (GEC-III) को मंजूरी दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत ₹1.86 लाख करोड़ के निवेश से 135 GW की ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और 50 GWh की बैटरी स्टोरेज क्षमता (BESS) विकसित की जाएगी।

निवेशकों के लिए सलाह

बैटरी स्टोरेज (BESS) का उपयोग ग्रिड स्टेबिलिटी के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह दिन के समय स्टोर की गई बिजली को शाम को ग्रिड में इंजेक्ट करने की अनुमति देगा। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के प्रोजेक्ट्स के लिए 'परमानेंट ग्रिड एक्सेस' और ट्रांसमिशन लाइनों के पूरा होने की टाइमलाइन पर कड़ी नजर रखें, क्योंकि यही कैश फ्लो को स्थिर रखने का आधार है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.