तमिलनाडु सरकार ने अपनी नई बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) पॉलिसी का ऐलान कर दिया है। इसके तहत **1 अप्रैल 2027** से सभी बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए बैटरी स्टोरेज लगाना अनिवार्य होगा, जिसका सीधा असर रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के मार्जिन पर पड़ सकता है।
क्या है नई पॉलिसी?
तमिलनाडु सरकार ने अगले तीन सालों में राज्य में 2.5 GW की स्टोरेज क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा है। नई पॉलिसी के अनुसार, 1 MW या उससे अधिक के किसी भी नए सोलर या सोलर-हाइब्रिड प्रोजेक्ट को अब बैटरी स्टोरेज के साथ आना होगा। डेवलपर्स को अपनी इंस्टॉल्ड क्षमता का कम से कम 10% स्टोरेज आउटपुट देना होगा, जो 4 घंटे तक पावर डिस्चार्ज करने में सक्षम हो।
सरकार की तरफ से राहत और नियम
कंपनियों को इस नई तकनीक के लिए प्रेरित करने हेतु, सरकार ने पात्र प्रोजेक्ट्स पर 10 वर्षों के लिए ट्रांसमिशन और व्हीलिंग चार्जेस में 100% की छूट देने का फैसला किया है। इसके अलावा, मौजूदा रिन्यूएबल एनर्जी सबस्टेशनों को भी 2028 फाइनेंशियल ईयर तक 5% और 2029 फाइनेंशियल ईयर तक अतिरिक्त 5% क्षमता लगाने का आदेश दिया गया है।
साथ ही, 'पेपर प्रोजेक्ट्स' की समस्या को खत्म करने के लिए एक डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया गया है, जो कंस्ट्रक्शन टाइमलाइन पर कड़ी नजर रखेगा।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह पॉलिसी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए एक बड़ा बदलाव है। बैटरी इंटीग्रेशन से प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत (Capital Cost) काफी बढ़ जाएगी। हालांकि सरकारी रियायतें मिल रही हैं, लेकिन अगर कंपनियां इन खर्चों को आगे पास नहीं कर पाईं, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।
इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में बैटरी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन का रिस्क भी बना हुआ है। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियां कैसे अपनी एग्जीक्यूशन स्ट्रेटजी को बदलती हैं और इन नई चुनौतियों के बीच अपनी मुनाफेदारी बनाए रखती हैं।
