यूरोप में सुजलॉन का नया प्लान
Suzlon Group ने ग्लोबल लेवल पर लगभग 21.5 GW की विंड एनर्जी क्षमता इंस्टाल की है, जिसमें 15.5 GW भारत में और करीब 6 GW विदेशी बाज़ारों में शामिल हैं। अब कंपनी ने यूरोप में अपने 5 MW और 6.3 MW वाले टर्बाइन मॉडल लॉन्च करके इस बाज़ार में अपनी पैठ बनाने की कोशिश शुरू की है। इसका मकसद यूरोप में बढ़ती रिपावरिंग (पुरानी पवन चक्कियों को बदलना) और नए प्रोजेक्ट्स के अवसरों का लाभ उठाना है, ताकि कंपनी अपनी रेवेन्यू स्ट्रीम्स को और डाइवर्सिफाई कर सके।
शेयर में हलचल और बाज़ार का नज़रिया
कंपनी के शेयरों में भी इस बीच काफी हलचल देखी गई। 21 अप्रैल 2026 को 2.75 करोड़ से ज़्यादा शेयर ट्रेड हुए, जो निवेशकों के लिए कंपनी की स्ट्रेटेजिक दिशा को समझने का एक मौका था। हालांकि, बाज़ार की मिली-जुली सेंटीमेंट को देखते हुए, 2025 के अंत में एक रेटिंग सर्विस ने तो इसके आउटलुक को 'Sell' रेटिंग भी दी थी।
रिपावरिंग का बड़ा अवसर
यूरोप इस समय विंड टर्बाइन रिपावरिंग के एक बड़े दौर से गुज़र रहा है। अनुमान है कि 2030 तक वहाँ की 86 GW ऑपरेशनल कैपेसिटी अपनी लाइफ के अंतिम चरण में होगी। यह भविष्य में नए, ज़्यादा पावरफुल टर्बाइनों के लिए एक बड़ा बाज़ार है, जो पुरानी, कम एफिशिएंट मशीनों की जगह ले सकें। उदाहरण के लिए, जर्मनी अपने 2030 तक 115 GW विंड पावर के लक्ष्य को पाने के लिए रिपावरिंग प्रोजेक्ट्स पर काफी निर्भर कर रहा है।
दिग्गजों से सीधी टक्कर
लेकिन, सुजलॉन के लिए यह राह आसान नहीं होगी। इस बाज़ार में Vestas जैसी दिग्गज कंपनियों का दबदबा है, जिसका 2026 की शुरुआत तक ग्लोबल मार्केट में करीब 19% (चीन को छोड़कर 25% से ज़्यादा) शेयर था। Vestas ने 2026 की शुरुआत तक लगभग €16.8 बिलियन का रेवेन्यू और 7-9% का प्रॉफिट मार्जिन दर्ज किया है। वहीं, Siemens Gamesa 2024 में चीन के बाहर तीसरा सबसे बड़ा प्लेयर था और 2026 के फाइनेंशियल ईयर में ब्रेक-ईवन का लक्ष्य रखे हुए है। खासकर ऑफशोर प्रोजेक्ट्स के लिए, 2026 से शुरू होने वाले नए प्रोजेक्ट्स में 14-15 MW तक के टर्बाइन इस्तेमाल हो रहे हैं, जो सुजलॉन के लॉन्च किए गए मॉडल से काफी बड़े हैं।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
सुजलॉन के 5 MW और 6.3 MW टर्बाइन शायद कुछ खास ऑनशोर रिपावरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए फिट हों, लेकिन प्रतिद्वंद्वियों द्वारा डिप्लॉय की जा रही एडवांस्ड ऑफशोर टेक्नोलॉजी की तुलना में इनका छोटा स्केल, मार्केट पोजिशनिंग पर सवाल खड़े करता है। यह टेक्नोलॉजिकल डिसएडवांटेज, बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए डील हासिल करने में रुकावट बन सकता है। यूरोप के बड़े मैन्युफैक्चरर्स लगातार ज़्यादा कैपेसिटी वाले टर्बाइन ला रहे हैं, और ऑनशोर में भी यह ट्रेंड दिख रहा है। इससे सुजलॉन का एड्रेसेबल मार्केट शायद छोटे रिपावरिंग कामों या कम जटिल नए इंस्टॉलेशन तक सीमित हो जाए, जो प्राइस-सेंसिटिव बाज़ार में प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
इसके अलावा, सुजलॉन को Vestas और Siemens Gamesa जैसे स्थापित दिग्गजों से भी निपटना होगा, जिनके पास बेहतर स्केल, डेवलप्ड सप्लाई चेन और बड़े सर्विस नेटवर्क्स हैं। इन कंपनियों के दशकों का अनुभव उन्हें खास पहचान बनाने और फायदे वाले कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने में मदद करता है।
साथ ही, यूरोपीय विंड प्रोजेक्ट्स ग्रिड एक्सेस, लंबी परमिटिंग टाइमलाइन और साइट रेडीनेस जैसी बढ़ती जटिलताओं का सामना करते हैं, जो एग्जीक्यूशन में देरी और प्रॉफिटेबिलिटी पर असर डाल सकती हैं। सुजलॉन की पिछली फाइनेंशियल दिक्कतें और भारी कर्ज, भले ही अब रीस्ट्रक्चर हो गए हों, वे अब भी चिंता का विषय बने हुए हैं। हालिया रिकवरी के संकेतों के बावजूद, एग्जीक्यूशन की रफ़्तार और नज़दीकी समय के ऑर्डर इनफ्लो पर सवाल बने हुए हैं।
एनालिस्ट्स का पॉजिटिव नज़रिया
इन तमाम कॉम्पिटिटिव प्रेशर और जोखिमों के बावजूद, एनालिस्ट्स का नज़रिया सुजलॉन के भविष्य को लेकर आम तौर पर पॉजिटिव है। 13 एनालिस्ट्स की 'Strong Buy' कंसेंसस रेटिंग है, और औसतन ₹63.54 का 12-महीने का टारगेट प्राइस बताता है कि मौजूदा स्तरों से 20% से ज़्यादा की संभावित अपसाइड है। JM Financial और Motilal Oswal जैसी ब्रोकरेज फर्मों ने भी ₹64-₹66 के टारगेट के साथ 'Buy' रेटिंग दोहराई है। ये पॉजिटिव अनुमान इस बात पर निर्भर करते हैं कि सुजलॉन अपने प्रोजेक्ट्स की कंप्लीशन बढ़ाए, ऑर्डर बैकलॉग को मजबूत करे, और भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की मजबूत मांग का फायदा उठाकर पॉजिटिव ग्रोथ साइकिल को बढ़ावा दे।
