सुप्रीम कोर्ट ने फ्यूल स्टेशनों और रसीदों पर एथेनॉल की मात्रा अनिवार्य रूप से दर्शाने की याचिका को खारिज कर दिया है। फिलहाल फ्यूल रिटेलर्स को नई लेबलिंग के नियमों से राहत मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है, जिसमें पेट्रोल पंपों पर बेचे जाने वाले ईंधन में एथेनॉल-ब्लेंडिंग के प्रतिशत को स्पष्ट रूप से दर्शाने की मांग की गई थी। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने इस मामले में सुनवाई करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित हाई कोर्ट जाने की छूट दी है। इस फैसले के बाद फिलहाल कंपनियों को अपने कामकाज में तुरंत बदलाव नहीं करना होगा।
कंपनियों के लिए राहत और चुनौतियां
Indian Oil, Bharat Petroleum, और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए यह एक बड़ी राहत है। उन्हें अब लेबलिंग से जुड़े नए अनुपालन खर्चों (compliance costs) से नहीं जूझना पड़ेगा। हालांकि, कंपनियों को Bureau of Indian Standards (BIS) के IS 15464 मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा, जो एथेनॉल की 99.6% शुद्धता अनिवार्य करते हैं।
क्वालिटी कंट्रोल पर जोर
कंपनियां पहले ही ईंधन की गुणवत्ता को लेकर काफी सतर्क हैं। रिटेल नेटवर्क पर रोजाना वाटर-इनग्र्रेस और क्लोराइड टेस्टिंग की जा रही है ताकि ईंधन में किसी भी तरह की मिलावट न हो। हालांकि कोर्ट ने लेबलिंग अनिवार्य करने से इनकार किया है, लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर अभी भी ईंधन की क्वालिटी और इंजन पर इसके असर को लेकर चिंतित है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां कैसे अपनी क्वालिटी-कंट्रोल ऑडिट की लागत को मैनेज करती हैं और भविष्य में सरकार क्लोराइड जैसे संदूषकों (contaminants) पर क्या सख्त नियम लाती है।
