सुप्रीम कोर्ट ने 100% इथेनॉल से चलने वाले वाहनों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार से एक ठोस रोडमैप मांगा है। हालांकि नियम E100 फ्यूल की अनुमति देते हैं, लेकिन सरकार अभी भी 20% ब्लेंडिंग लिमिट पर ही टिकी है। यह नीतिगत अनिश्चितता निवेशकों और ऑयल कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भारत में 100% इथेनॉल (E100) से चलने वाले वाहनों की व्यावहारिक स्थिति पर विस्तृत ब्यौरा मांगा है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने यह सवाल उठाया कि क्या हमारा मौजूदा फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह इथेनॉल पर चलने वाले वाहनों का भार उठाने के लिए तैयार है।
सरकार की पॉलिसी में विरोधाभास
यह न्यायिक जांच ऐसे समय पर आई है जब सड़क परिवहन मंत्रालय ने सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स में बदलाव कर फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को E100 पर चलने की इजाजत दी है। इसके बावजूद, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने साफ कर दिया है कि पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की मौजूदा 20% की लिमिट को बढ़ाने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है। टेक्नोलॉजी को अनुमति देना और फ्यूल सप्लाई का उपलब्ध न होना, यही कोर्ट की चिंता का मुख्य विषय है।
ऑयल कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कोर्ट में स्वीकार किया कि E100 को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में बड़े बदलाव की जरूरत होगी। कोर्ट ने सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, जैसे कि Indian Oil Corporation Limited, Bharat Petroleum Corporation Limited, और Hindustan Petroleum Corporation Limited के साथ चल रहे लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट यह परख रहा है कि इथेनॉल पॉलिसी में बार-बार बदलाव करने से इन कंपनियों की फ्यूल सप्लाई व्यवस्था कहीं अस्थिर न हो जाए।
किसान और शुगर सेक्टर पर नजर
बेंच ने यह भी जोर दिया कि पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरा करने के साथ-साथ किसानों के आर्थिक हितों का ख्याल रखना भी जरूरी है। इथेनॉल प्रोडक्शन से होने वाला फायदा सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचना चाहिए। शुगर और डिस्टिलरी सेक्टर पूरी तरह सरकार की प्रोक्योरमेंट प्राइसिंग पर निर्भर हैं, इसलिए निवेशकों को अब कोर्ट की अगली सुनवाई पर पैनी नजर रखनी होगी, जहां सरकार अपना भविष्य का स्टैंड स्पष्ट करेगी।
