हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने और सैन्य तनाव के बीच Brent Crude की कीमतें उछलकर **$102.11** प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। यह भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इससे एनर्जी इम्पोर्ट बिल बढ़ सकता है और महंगाई का खतरा गहरा सकता है।
दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है, लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के चलते यह रास्ता फिलहाल ठप हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 4 ऑयल टैंकर नष्ट हो चुके हैं और 2 जहाजों को जब्त कर लिया गया है। 2 नवंबर 2026 को Qeshm Island पर हुए अमेरिकी एयरस्ट्राइक्स ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं खतरे?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, जो इसी रास्ते से आता है। तेल की कीमतों में इस उछाल से न केवल रुपए पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि महंगाई भी बढ़ सकती है।
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां: IOC, BPCL और HPCL के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती लागत को पूरी तरह से ग्राहकों पर डालना आसान नहीं होता।
- एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स: ATF और डीजल के दाम बढ़ने से इन कंपनियों का प्रॉफिट प्रभावित हो सकता है।
- फर्टिलाइजर कंपनियां: नेचुरल गैस और पेट्रोकेमिकल्स का उपयोग करने वाली खाद कंपनियों की लागत बढ़ना तय है।
आगे की राह (Outlook)
बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि यह तनाव जारी रहा, तो कच्चे तेल की कीमतें $120 के स्तर को भी पार कर सकती हैं। जहाजों का बीमा प्रीमियम और फ्रेट कॉस्ट बढ़ने से ग्लोबल सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ रहा है। निवेशकों को अब कतर की मध्यस्थता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता पर बारीक नजर रखनी होगी।
