श्रीलंका में हाल ही में हुए देशव्यापी ब्लैकआउट (Blackout) ने सोलर पावर ग्रिड के एक बड़े खतरे को उजागर कर दिया है। ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों के चलते हजारों सोलर सिस्टम को बंद करना पड़ा, जो साउथ एशियाई देशों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
श्रीलंका में 17 अक्टूबर को आए पावर फेलियर ने साउथ एशिया में रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांजिशन की बड़ी तकनीकी चुनौतियों को सामने ला दिया है। ग्रिड के ठप होते ही नेशनल ऑपरेटर को पावर सिस्टम को बचाने के लिए रूफटॉप सोलर सिस्टम्स को डिस्कनेक्ट करने का सख्त फैसला लेना पड़ा। यह घटना पुरानी पड़ चुकी ग्रिड प्रणालियों की सीमाओं को दर्शाती है।\n\n### ग्रिड की स्थिरता पर खतरा\n\nपारंपरिक कोयला और हाइड्रो पावर प्लांट ग्रिड को स्टेबिलिटी देने के लिए मैकेनिकल इनर्शिया प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, सोलर एनर्जी स्मार्ट इनवर्टर पर आधारित होती है, जो ग्रिड में अस्थिरता महसूस होते ही खुद को डिस्कनेक्ट कर लेते हैं। श्रीलंका, जहां 3,000 MW से ज्यादा सोलर कैपेसिटी है, अब इस अनियंत्रित पावर फ्लो को मैनेज करने में संघर्ष कर रहा है।\n\n### क्षेत्रीय संकट और निवेशकों के लिए सीख\n\nयह केवल श्रीलंका का मुद्दा नहीं है, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भी तेजी से बढ़ते सोलर एडॉप्शन का सामना पुरानी डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क्स से हो रहा है। श्रीलंका के सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने तो सितंबर में ही नए सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए 'फीड-इन टैरिफ' तक सस्पेंड कर दिए थे।\n\n### भारतीय निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\n\nभारत अपने रूफटॉप सोलर लक्ष्यों को तेजी से पूरा कर रहा है, लेकिन असली चुनौती ग्रिड इंटीग्रेशन की है। सोलर वोलेटिलिटी को मैनेज करने के लिए अब 'स्मार्ट ग्रिड्स', ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग सिस्टम और 'बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम' (BESS) में भारी निवेश की जरूरत है। निवेशकों के लिए अब ग्रिड ऑटोमेशन और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियां एक नया फोकस एरिया बन सकती हैं, क्योंकि पावर यूटिलिटीज का पूरा ध्यान अब मॉडर्नाइजेशन पर शिफ्ट होगा।
