दक्षिण पूर्व एशिया 'डीपवाटर 2.0' के नाम से एक बड़ी पहल कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य पुराने और घटते गैस भंडारों की जगह नए डीपवाटर गैस रिसोर्सेज को विकसित करना है। अनुमान है कि इंडोनेशिया, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे देशों में 28 ट्रिलियन क्यूबिक फीट (tcf) गैस का भंडार मौजूद है। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 2030 तक $20 बिलियन से अधिक का निवेश अपेक्षित है। भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में बढ़ती लागतों और व्यवधानों को देखते हुए, इस क्षेत्र की ऊर्जा सुरक्षा तेजी से इन जटिल ऑफशोर परियोजनाओं पर निर्भर हो रही है।
हालांकि, 'डीपवाटर 2.0' का वित्तीय परिदृश्य काफी चुनौतीपूर्ण है। विश्लेषण बताते हैं कि अधिकांश परियोजनाओं में इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) 15% से कम रहने की संभावना है, जो कि सामान्य वैश्विक डीपवाटर परियोजनाओं से कम है। ऐसे में गलतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। यहां तक कि लागत में 20% की मामूली बढ़ोतरी, गैस की कीमतों में 20% की गिरावट, या उत्पादन में 20% की कमी भी किसी परियोजना के मूल्य को लगभग 150% तक कम कर सकती है। वहीं, तीन साल की देरी परियोजना के मूल्य को आधा कर सकती है। वैश्विक सप्लाई चेन की दिक्कतें और बढ़ती महंगाई, जो संघर्षों से और बढ़ गई है, लागतों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं और आवश्यक उपकरणों की डिलीवरी के समय को लंबा खींच रही हैं।
कई बड़ी ऊर्जा कंपनियां इन प्रमुख परियोजनाओं को आगे बढ़ा रही हैं। Eni इंडोनेशिया के कुटेई बेसिन में हब विकसित कर रही है, जिसका लक्ष्य 2028 तक गेंग नॉर्थ जैसे क्षेत्रों से पहला गैस उत्पादन शुरू करना है। शेल (Shell) मलेशिया-ब्रूनेई सीमा के पास गुमुसुत-काकप-गेरोंगगोंग-जागुस ईस्ट (GKGJE) परियोजना और रोसमारी-मेजोराम विकास में शामिल है। पेट्रोनास (Petronas) और मित्सुबिशी कॉर्पोरेशन (Mitsubishi Corporation) ब्रुनेई के केलिडंग क्लस्टर को विकसित कर रहे हैं, जिसका उत्पादन 2030 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है। मुबाडाला एनर्जी (Mubadala Energy) उत्तरी सुमात्रा में अपने टंगकुलो और लायरान की खोजों में तेजी ला रही है, जिसमें टंगकुलो गैस 2028 के अंत तक मिलने की उम्मीद है। भले ही ऑपरेटर अपनी योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रहे हों, सफलता अनुशासित निष्पादन और लॉजिस्टिकल चुनौतियों से निपटने पर निर्भर करती है। अतीत की डीपवाटर कोशिशें ('डीपवाटर 1.0' 2008-2017 तक) व्यवहार्यता दिखा चुकी हैं, लेकिन विभिन्न मुद्दों के कारण उनमें असमान प्रगति देखी गई थी।
इन डीपवाटर गैस योजनाओं के सामने महत्वपूर्ण जोखिम हैं जो परियोजना के वित्त को डुबो सकते हैं। मुख्य मुद्दा तंग वित्तीय मार्जिन है; किसी भी निष्पादन में चूक, लागत में बढ़ोतरी या देरी से व्यवहार्यता खतरे में पड़ जाती है। भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से मध्य पूर्व में, महंगाई को बढ़ा रहे हैं और आवश्यक सबसी (subsea) पुर्जों के डिलीवरी समय को लंबा कर रहे हैं, जिससे लागत और शेड्यूल में बड़ी अनिश्चितता आ गई है। क्षेत्रीय कर और रॉयल्टी संरचनाएं भी ऑपरेटरों को इन जोखिमों से पर्याप्त रूप से नहीं बचा सकती हैं। चूंकि परियोजना का मूल्य लागत, कीमतों और देरी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, इसलिए छोटे विचलन भी अरबों के निवेश को नष्ट कर सकते हैं। क्षेत्र में अतीत की डीपवाटर परियोजनाओं को भी व्यावसायिक, तकनीकी और नियामक बाधाओं का सामना करना पड़ा है, जो बार-बार होने वाली निष्पादन कठिनाइयों का संकेत देते हैं।
अंततः, दक्षिण पूर्व एशिया की 'डीपवाटर 2.0' गैस पहल की सफलता ऑपरेशनल निष्पादन पर निर्भर करती है। वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों के बीच क्षेत्र की स्थिरता के बावजूद, तंग आर्थिक स्थितियां और कई बाहरी जोखिमों का मतलब है कि कोई भी देरी या लागत वृद्धि परियोजना की व्यवहार्यता को खतरे में डालती है। घरेलू बाजारों और निर्यात संयंत्रों तक गैस पहुंचाना क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। अगले पांच साल यह तय करेंगे कि क्या ये महत्वाकांक्षी डीपवाटर परियोजनाएं समय पर और बजट के भीतर पूरी हो सकती हैं, या विफलता की भारी लागत संभावित लाभों पर भारी पड़ेगी।
