अगस्त 2026 में सऊदी अरब का क्रूड ऑयल प्रोडक्शन घटकर **6.238 मिलियन बैरल प्रति दिन** रह गया है, जो 1990 के बाद का सबसे निचला स्तर है। क्षेत्रीय विवादों के कारण एक्सपोर्ट रूट बाधित होने से ग्लोबल सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे भारत के लिए इंपोर्ट बिल और इन्फ्लेशन का खतरा बढ़ गया है।
उत्पादन में बड़ी गिरावट और कारण
सऊदी अरब का क्रूड ऑयल प्रोडक्शन 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन कम हो गया है। इस गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है, जिसने रेड सी और स्टेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम शिपिंग रूटों को जोखिम में डाल दिया है। टैंकर-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, सऊदी का एक्सपोर्ट लगभग एक-तिहाई घटकर 3 मिलियन बैरल प्रति दिन के करीब आ गया है।
इन्वेंट्री का इस्तेमाल
सप्लाई में आई इस कमी को पूरा करने के लिए सऊदी अरब अपनी तेल इन्वेंट्री का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे सप्लाई लेवल 7.122 मिलियन बैरल प्रति दिन पर बना हुआ है। हालांकि, यह कोई स्थायी समाधान नहीं है और यदि शिपिंग मार्ग बाधित रहे, तो ग्लोबल मार्केट में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
भारतीय बाजार पर असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर रुपये की वैल्यू और घरेलू महंगाई पर पड़ेगा।
- फायदा किसे होगा: ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां, जो मार्केट-लिंक्ड कीमतों पर तेल बेचती हैं, उनके रेवेन्यू में सुधार हो सकता है।
- नुकसान किसे होगा: IOCL, BPCL और HPCL जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि वे बढ़ती लागत का बोझ पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल सकतीं। इसके अलावा, एविएशन और केमिकल सेक्टर की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ने की भी पूरी संभावना है।
अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ये क्षेत्रीय तनाव कब तक चलता है और क्या OPEC+ उत्पादन बढ़ाने को लेकर कोई नया फैसला लेता है।
