एशियाई तेल बाजार में बड़ा बंटवारा: प्रतिबंधों के चलते भारत ने घटाई रूस से खरीद, चीन ने बढ़ाई खरीदारी!

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AuthorAditya Rao|Published at:
एशियाई तेल बाजार में बड़ा बंटवारा: प्रतिबंधों के चलते भारत ने घटाई रूस से खरीद, चीन ने बढ़ाई खरीदारी!
Overview

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों (international sanctions) के बीच एशियाई तेल बाजार (Asian oil market) बंटता नजर आ रहा है। भारत ने रूस से तेल खरीद में भारी कटौती की है, जहाँ जनवरी **2026** में यह घटकर **€2.2 बिलियन** रह गया। वहीं, चीन ने इसी महीने रूस से तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा दिया है।

प्रतिबंधों का बदलता खेल: भारत का बदला रास्ता, चीन की बढ़ी मांग

ग्लोबल मार्केट से मिले झटकों और कड़े होते अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों (international sanctions) के चलते एशियाई तेल बाजार (Asian oil market) में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहाँ भारत रूसी तेल (Russian oil) की खरीद कम कर रहा है, वहीं चीन अपनी आयात क्षमता को बढ़ा रहा है। यह विभाजन एशियाई ऊर्जा रणनीतियों में एक बड़ा मोड़ दर्शाता है।

भारत का रूस से घटता नाता

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों (international sanctions) के चलते भारत का रूसी हाइड्रोकार्बन पर खर्च जनवरी 2026 में घटकर €2.2 बिलियन रह गया। यह पिछले महीने की तुलना में कम है। इसकी मुख्य वजह रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) की जामनगर रिफाइनरी (Jamnagar refinery) द्वारा रूसी तेल का आयात रोकना है। यह कदम प्रमुख सप्लायर रोसनेफ्ट (Rosneft) पर लगे ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) सैंक्शन्स के कारण उठाया गया।

जनवरी में भारत का कुल रूसी तेल आयात 11.6 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) था, जो पहले के मुकाबले काफी कम है। इसके बजाय, भारत सऊदी अरब (Saudi Arabia) जैसे आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख कर रहा है। फरवरी 2026 में सऊदी अरब से 10-11 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) की शिपमेंट की उम्मीद है, जो 2019 के अंत के बाद का उच्चतम स्तर होगा। अमेरिकी दबाव के चलते भी भारत रूसी तेल की खरीद कम कर रहा है, जिसके बदले में अमेरिका ने भारत के सामानों पर 25% टैरिफ हटाया था। इसके अलावा, यूरोपीय संघ (EU) द्वारा 21 जनवरी 2026 से रूसी क्रूड से बने तेल उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भी उन भारतीय रिफाइनरियों पर दबाव डाला है जो EU को एक्सपोर्ट करती हैं। केप्लर (Kpler) के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2026 तक भारत का रूसी तेल आयात घटकर 8 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) तक आ सकता है, जो कई सालों का सबसे निचला स्तर होगा।

इस बदलाव के कारण भारत के क्रूड इम्पोर्ट बिल में $2-$3 प्रति बैरल की बढ़ोतरी का अनुमान है।

चीन का बढ़ता आकर्षण: रूस से रिकॉर्ड तेल आयात

इसके बिल्कुल विपरीत, चीन ने रूस से अपना आयात काफी बढ़ा दिया है। जनवरी 2026 में चीनी रिफाइनरियों ने Urals ग्रेड क्रूड की खरीद दोगुनी कर दी, जो रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई। कुल मिलाकर, चीन का रूस से समुद्री मार्ग से क्रूड आयात 18% महीने-दर-महीने बढ़कर €4 बिलियन हो गया। इससे चीन दुनिया का सबसे बड़ा रूसी जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) खरीदार बन गया है, जो टॉप खरीदारों से कुल एक्सपोर्ट रेवेन्यू का 50% हिस्सा है।

जनवरी में रूस से चीन को हुई समुद्री मार्ग से क्रूड की शिपमेंट 18.6 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई, जिसने सऊदी अरब के 12 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) को पीछे छोड़ दिया। इस तरह, रूस जनवरी में चीन का शीर्ष क्रूड सप्लायर बन गया। चीन ने यह बढ़त वैश्विक बाजार के दबावों और प्रतिबंधों के बावजूद हासिल की है, क्योंकि वे छूट वाली कीमतों और शायद कम सख्त प्रवर्तन का फायदा उठा रहे हैं।

वैल्यूएशन गैप और प्राइस कैप की विफलता

यूरोपीय संघ और यूके द्वारा 1 फरवरी 2026 से लागू की गई $44.10 प्रति बैरल की प्राइस कैप मैकेनिज्म रूसी तेल की कीमतों को रोकने में नाकाम साबित हो रही है। जनवरी में Urals क्रूड का औसत मूल्य $54.2 प्रति बैरल रहा और यह अक्सर प्राइस कैप से काफी ऊपर ट्रेड कर रहा है। इससे पता चलता है कि जहाँ सैंक्शन्स भारत के खरीद निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं, वहीं चीन जैसे खरीदार रूसी क्रूड को काफी छूट पर हासिल कर पा रहे हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) और रूसी Urals के बीच $15-30 प्रति बैरल की बढ़ती छूट गैर-प्रतिबंध लगाने वाले देशों के लिए एक बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन है।

वैश्विक स्तर पर, भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई में बाधाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। फरवरी 2026 के अंत में WTI लगभग $66.51/बैरल और ब्रेंट लगभग $71.69/बैरल पर ट्रेड कर रहा था। हालाँकि, जनवरी 2026 में सर्दियों के मौसम और उत्पादन संबंधी बाधाओं के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में गिरावट देखी गई थी।

रिस्क फैक्टर्स: 'शैडो' फ्लीट और टालमटोल

सैंक्शन्स की प्रभावशीलता लगातार रूस की "शैडो" फ्लीट (shadow fleet) यानी टैंकरों के एक गुप्त बेड़े और जटिल स्वामित्व संरचनाओं पर निर्भर करती है। ये 'स्पेशल पर्पज व्हीकल्स' (SPVs) रोसनेफ्ट (Rosneft) और लुकोइल (Lukoil) जैसी प्रतिबंधित संस्थाओं को निर्यात जारी रखने की अनुमति देते हैं। जनवरी 2026 में रूस के लगभग आधे क्रूड एक्सपोर्ट का वहन प्रतिबंधित 'शैडो' टैंकरों द्वारा किया गया। यह टालमटोल की रणनीति, कुछ आयात करने वाले देशों की सीमित प्रवर्तन क्षमता के साथ मिलकर, रूस को पश्चिमी उपायों के बावजूद महत्वपूर्ण एक्सपोर्ट वॉल्यूम बनाए रखने में मदद करती है। CREA (Centre for Research on Energy and Clean Air) इन कमजोरियों को दूर करने के लिए समुद्री सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध की वकालत करता है।

भारत के लिए: रूसी क्रूड से दूरी बनाने की यह रणनीति नियामक अनुपालन के कारण है, लेकिन इसके कारण भारत के क्रूड इम्पोर्ट बिल में $2-$3 प्रति बैरल की बढ़ोतरी का अनुमान है। रियायती रूसी बैरल को हटाकर, भारत को अधिक महंगी, हालांकि संभावित रूप से अधिक विश्वसनीय, आपूर्तिकर्ताओं से स्रोत खोजना पड़ रहा है। इसके अलावा, सऊदी अरब जैसे विशिष्ट आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता नए भू-राजनीतिक निर्भरताएं और बाजार की गतिशीलता पैदा करती है।

चीन के लिए: रूस पर बढ़ती ऊर्जा निर्भरता चीन के लिए अपनी कमजोरियां पैदा करती है। हालाँकि अभी वे छूट वाली कीमतों से लाभ उठा रहे हैं, लेकिन यह एक ही, भले ही बढ़ते हुए, सप्लायर पर निर्भरता को गहरा करता है, जो भविष्य में मूल्य वार्ता की शक्ति को सीमित कर सकता है। रूसी व्यापार में शामिल चीनी संस्थाओं को सीधे लक्षित करने वाले किसी भी भविष्य के प्रतिबंधों से बीजिंग की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति बाधित हो सकती है।

मैनेजमेंट और एंटिटी रिस्क: प्रमुख रूसी तेल उत्पादक रोसनेफ्ट (Rosneft) और लुकोइल (Lukoil) पर OFAC सैंक्शन्स ने पहले ही परिचालन को बाधित कर दिया है और अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों के विनिवेश (divestments) के लिए मजबूर किया है। लुकोइल (Lukoil) की $20 बिलियन से अधिक की अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों को महत्वपूर्ण व्यवधान का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि रूस इन प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इन प्रतिबंधों को नेविगेट करने के कारण परिचालन लागत, उच्च फ्रेट और टैंकरों का बढ़ा हुआ खर्च इसके तेल राजस्व को कम कर रहा है।

भविष्य का परिदृश्य

केप्लर (Kpler) का अनुमान है कि मार्च 2026 में भारत का रूसी तेल आयात 8 लाख से 10 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) के बीच स्थिर हो सकता है। यह निरंतर, यद्यपि कम, जुड़ाव का संकेत देता है। जारी व्यावसायिक और नीतिगत घर्षणों के कारण 2026 में भारत के क्रूड आयात मिश्रण में रूस की हिस्सेदारी पिछले वर्षों की तुलना में कम दायरे में स्थिर होने की उम्मीद है।

इस बीच, चीन का रूसी क्रूड आयात मजबूत बना रहने की उम्मीद है, जो 20 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) से अधिक हो सकता है। इससे चीन रूस का प्राथमिक एशियाई ऊर्जा ग्राहक बना रहेगा। वैश्विक तेल बाजार इन विभाजित मांग पैटर्न से जूझता रहेगा, जो प्रतिबंधों की प्रभावशीलता, भू-राजनीतिक पुनर्मूल्यांकन और आपूर्ति प्रवाह को मोड़ने के रूस के निरंतर प्रयासों से प्रभावित होगा।

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