Solar Energy Corporation of India (SECI) ने **1GW** का राउंड-द-क्लॉक रिन्यूएबल एनर्जी टेंडर **₹5.25** प्रति यूनिट की दर पर अलॉट किया है। हालांकि यह भारत के ग्रीन एनर्जी लक्ष्य के लिए अच्छी खबर है, लेकिन ट्रांस्मिसन वेवर खत्म होने और स्टोरेज की बढ़ती लागत निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
Solar Energy Corporation of India (SECI) द्वारा 1GW का यह टेंडर रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में एक बड़ा कदम है। इसका मुख्य उद्देश्य दिन भर स्थिर बिजली की सप्लाई सुनिश्चित करना है, ताकि कोयले पर निर्भरता को कम किया जा सके। लेकिन ₹5.25 प्रति यूनिट का यह टैरिफ कई स्ट्रक्चरल चुनौतियों से घिरा हुआ है जो भविष्य में प्रोजेक्ट्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर डाल सकता है।
ट्रांस्मिसन वेवर हटने का असर
अब तक रिन्यूएबल एनर्जी की कीमतें इसलिए कम बनी हुई थीं क्योंकि कंपनियों को इंटरस्टेट ट्रांस्मिसन चार्जेस पर छूट मिल रही थी। यह सरकारी छूट अगले 24 महीनों में धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। इंडस्ट्री जानकारों का मानना है कि इस छूट के हटने से बिजली की लागत में कम से कम 50 पैसे प्रति यूनिट का इजाफा हो सकता है। जिन कंपनियों ने बहुत आक्रामक बिडिंग (aggressive bidding) की है, उनके लिए मार्जिन बचाना मुश्किल हो सकता है।
स्टोरेज और सप्लाई चेन की बाधाएं
राउंड-द-क्लॉक पावर सप्लाई के लिए सिर्फ सोलर या विंड काफी नहीं हैं; इसके लिए लार्ज-स्केल बैटरी स्टोरेज की जरूरत होती है। फिलहाल बैटरी टेक्नोलॉजी काफी महंगी है और जमीन अधिग्रहण (land acquisition) में भी काफी खर्च आता है। इसके अलावा, रिन्यूएबल सेक्टर अभी भी सोलर मॉड्यूल और अन्य कंपोनेंट्स के लिए बाहरी देशों पर निर्भर है। ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी में थोड़ा सा भी बदलाव प्रोजेक्ट की लागत को अस्थिर बना सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इन्वेस्टर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि पावर कंपनियां इन कॉम्प्लेक्स प्रोजेक्ट्स के बीच अपने मार्जिन को कैसे मेंटेन करती हैं। रिन्यूएबल सेक्टर का भविष्य अब स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी में निवेश पर टिका है। निवेशकों को कंपनियों के डेट लेवल (debt level) पर नजर रखनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या वे बढ़ती लागत के बावजूद अच्छा रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) बनाए रख पा रही हैं या नहीं।
