कीमत का खेल: क्यों गिरी रूस की तेल से कमाई?
रूस के तेल एक्सपोर्ट की मात्रा तो लगभग 33.3 लाख बैरल प्रति दिन पर स्थिर है, लेकिन इससे होने वाली कमाई में भारी गिरावट देखी जा रही है। जनवरी में यह कमाई पिछले 5 सालों में सबसे कम रही। इस बड़ी गिरावट की वजहें साफ हैं: वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, रूसी Urals क्रूड पर भारी डिस्काउंट, और मजबूत होता रूसी रूबल। Urals क्रूड इस वक्त ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट (Brent) क्रूड के मुकाबले लगभग 15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता बेचा जा रहा है। Urals की कीमत करीब 54.63 डॉलर प्रति बैरल है, जबकि ब्रेंट 69.38 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। ऐतिहासिक रूप से यह डिस्काउंट सिर्फ 2-3 डॉलर होता था, लेकिन 2025 के अंत में प्रतिबंधों और व्यापारिक पेचीदगियों के चलते यह बढ़कर 23-27 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था। इसके अलावा, 2025 में 44% तक मजबूत हुए रूबल की वजह से डॉलर में कमाई का रूबल में मिलने वाला मूल्य घट गया है, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ गया है।
एशिया की ओर बढ़ते शिपमेंट: भारत से दूरी, चीन से यारी
जैसे-जैसे पारंपरिक बाजार कम आकर्षक हो रहे हैं, रूस का तेल तेज़ी से एशिया की ओर मुड़ रहा है। भारत को होने वाला तेल निर्यात (Shipments) अपने चरम स्तर से आधा हो गया है, जो पहले 20 लाख बैरल प्रति दिन से भी ज्यादा था, वह अब घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रति दिन रह गया है, और फरवरी के पहले हफ्ते में तो यह 9 लाख बैरल प्रति दिन तक गिर गया। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि भारतीय रिफाइनरियों पर अंतरराष्ट्रीय समझौतों का दबाव है, खासकर अमेरिका के साथ, जिसने व्यापारिक समझौतों के तहत रूसी तेल के आयात को रोकने की शर्त रखी है। दूसरी ओर, रूस के लिए चीन एक बड़ा सहारा बनकर उभरा है। अब एक दर्जन से ज्यादा टैंकर भारत के बजाय चीन की ओर जा रहे हैं। चीन को तेल की सप्लाई करीब 22 लाख बैरल प्रति दिन बनी हुई है। हालांकि, इन टैंकरों की लंबी यात्रा और कुल राजस्व की कमी लॉजिस्टिक्स और वित्तीय चुनौतियां खड़ी कर रही है। करीब 13.2 करोड़ बैरल कच्चा तेल अभी भी जहाजों पर लदा हुआ है।
आर्थिक सेहत और उत्पादन की चिंता
रूस की अर्थव्यवस्था तेल और गैस से होने वाली आय पर काफी निर्भर है, जो 2025 के पहले तीन तिमाहियों में बजट का करीब 24.5% था। विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के अंत तक बजट घाटा बढ़कर GDP का 3.5% से 4.4% तक पहुँच सकता है, जो तय लक्ष्य 1.6% से कहीं ज्यादा है। इसका मुख्य कारण तेल राजस्व में 18% की गिरावट और बढ़ते सैन्य खर्च हैं। रूस के 4.1 ट्रिलियन रूबल के वित्तीय भंडार (Fiscal Reserves) भी इस दर से राजस्व घटने पर एक साल में खत्म हो सकते हैं। रूस की अपनी तेल उत्पादन क्षमता भी दबाव में है। लगातार दूसरे महीने उत्पादन में गिरावट आई है, जो OPEC+ कोटे से भी नीचे चला गया है। यह दिखाता है कि गहरे डिस्काउंट के कारण तेल की बिक्री से लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। प्रमुख रूसी तेल कंपनी लुकोइल (Lukoil) ने भी गिरती कीमतों के कारण सरकारी मदद मांगी है।
भविष्य का अनुमान: सरप्लस का डर और वित्तीय अस्थिरता
आगामी 2026 में वैश्विक तेल बाजार में भारी सरप्लस (Surplus) रहने का अनुमान है, जहाँ सप्लाई मांग से 36 लाख बैरल प्रति दिन ज्यादा रहने की उम्मीद है। यह स्थिति कीमतों पर और दबाव डालेगी। मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव भले ही अल्पावधि में कीमतों को सहारा दे, लेकिन लंबी अवधि में कीमतें नरम रहने की संभावना है। 2026 में वैश्विक तेल मांग 9.3 लाख बैरल प्रति दिन बढ़ने का अनुमान है, जो मुख्य रूप से गैर-OECD देशों से आएगा। लेकिन, भारी सरप्लस के अनुमान से साफ है कि Urals क्रूड के मौजूदा दाम, जो डिस्काउंट के कारण लागत निकालने में संघर्ष कर रहे हैं, उनमें बड़ी तेजी की संभावना कम है। जब तक वैश्विक सप्लाई में कोई बड़ा बदलाव या रूस की ओर से निर्यात मात्रा और डिस्काउंट रणनीति में कमी नहीं आती। गिरता राजस्व, बढ़ता खर्च और कड़ा वैश्विक बाजार रूस के लिए अगले साल एक नाजुक वित्तीय स्थिति पेश कर रहा है।