हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के बीच भारत के लिए रूस से होने वाला क्रूड ऑयल आयात एक बड़ा सहारा बना है। रूस से होने वाली सप्लाई ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती दी है और रिफाइनिंग कंपनियों की लागत को भी नियंत्रित रखा है।
हॉर्मुज संकट के बाद रूस भारत के लिए ऊर्जा का एक प्रमुख बैकस्टॉप बनकर उभरा है। वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल के पारंपरिक रास्तों को बाधित कर दिया था, लेकिन रूसी तेल की निरंतर सप्लाई ने भारत को बाजार की बड़ी अस्थिरता से बचा लिया।
आयात के बदलते आंकड़े
आपूर्ति में आई रुकावट के दौरान, भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़कर 2.25 मिलियन बैरल प्रति दिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। यह भारत के कुल तेल आयात का करीब 50% था। हालांकि, सितंबर 2026 तक यह आंकड़ा थोड़ा कम होकर 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आ गया है। इस सस्ते रूसी तेल ने भारतीय तेल कंपनियों की खरीद लागत को काफी कम किया है।
रिफाइनिंग मार्जिन पर असर
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, BPCL और HPCL जैसी सरकारी कंपनियों के साथ-साथ निजी रिफाइनर्स को भी इस सस्ती सप्लाई का सीधा फायदा मिला है। स्थिर कच्चा माल मिलने से रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव कम हुआ है और सरकार को ईंधन की कीमतों में होने वाली उठापटक को संभालने में मदद मिली है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के करंट अकाउंट डेफिसिट और महंगाई को कंट्रोल रखने के लिहाज से बहुत अहम है।
जियोपॉलिटिकल और रेगुलेटरी रिस्क
व्यावसायिक फायदों के बावजूद, जियोपॉलिटिकल जोखिम बरकरार हैं। रूस और ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण अमेरिकी नीति और संभावित टैरिफ्स का डर निवेशकों के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहा है क्योंकि देश की प्राथमिकता 1.4 अरब नागरिकों को किफायती ईंधन मुहैया कराना है।
भविष्य की राह
यह साझेदारी केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ रही है। कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट का विस्तार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। निवेशक अब इस बात पर नजर रख रहे हैं कि यह साझेदारी वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भविष्य में कितनी स्थिर रहती है और नई परियोजनाओं से क्या नतीजे निकलते हैं।
