रूस का हाई-रिस्क LNG एक्सपोर्ट प्लान
रूस, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित (Sanctioned) लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) को साउथ एशियाई देशों को बेचने की कोशिश कर रहा है। यह कदम मौजूदा ग्लोबल एनर्जी सप्लाई क्रंच का फायदा उठाने के लिए उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस इस गैस को स्पॉट प्राइस से 40% तक कम कीमत पर बेच रहा है। इस पूरी प्रक्रिया को चीन और रूस की रहस्यमयी इंटरमीडियरी कंपनियों के जरिए मैनेज किया जा रहा है। ये कंपनियां कथित तौर पर शिपिंग डॉक्यूमेंट्स को फर्जी बनाकर गैस का ओरिजिन (Origin) छुपाती हैं, और इसे ओमान या नाइजीरिया जैसे गैर-प्रतिबंधित देशों से आया हुआ दिखाती हैं। इसका मकसद कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों से बचना है, जिनकी वजह से ज़्यादातर बड़े खरीदार ऊंचे ग्लोबल एनर्जी दामों के बावजूद इस गैस से दूर रहे हैं।
ग्लोबल मार्केट में हाहाकार
मौजूदा ग्लोबल मार्केट की हालत बेहद खराब है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) प्रभावी रूप से बंद है, और कतर की मुख्य एलएनजी एक्सपोर्ट फैसिलिटीज पर हुए हमलों ने सप्लाई को गंभीर रूप से सीमित कर दिया है। इस सप्लाई चेन में आई रुकावट से ग्लोबल नेचुरल गैस फ्लो का लगभग पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ है, जिससे दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। इसी मौके का फायदा उठाते हुए रूस अपनी आर्कटिक एलएनजी 2 (Arctic LNG 2) और पोर्तोवाया (Portovaya) प्रोजेक्ट्स से यह गैस बेचने की फिराक में है। आर्कटिक एलएनजी 2, रूस का सबसे बड़ा एलएनजी फैसिलिटी बनने वाला था, लेकिन शिपिंग दिक्कतों और खरीदारों की कमी के कारण यह क्षमता से कम पर चल रहा है।
भारत पर एनर्जी का दबाव
ऊर्जा आयात पर भारी निर्भर भारत, आमतौर पर ऐसे प्रतिबंधित एनर्जी प्रोडक्ट्स से बचने की कोशिश करता रहा है। भारत ने पहले भी कहा है कि वह रूस के ब्लैकलिस्टेड प्रोजेक्ट्स से एलएनजी नहीं खरीदेगा। हालांकि, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की मौजूदा बंदी और कतर की एलएनजी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के कारण बिगड़े एनर्जी संकट ने नई दिल्ली को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने पर मजबूर कर दिया है। मार्च 2026 में भारत का रूस से कच्चा तेल (Crude Oil) का आयात फरवरी की तुलना में 90% बढ़ गया, जबकि पश्चिम एशिया से सप्लाई में आई दिक्कतों के कारण कुल तेल आयात 15% घट गया। यह दिखाता है कि भू-राजनीतिक चिंताओं के बावजूद, भारत रूसी ऊर्जा पर अधिक निर्भर होता जा रहा है।
सप्लाई चेन पर भारी असर
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में आई रुकावटों ने भारत के ऊर्जा आयात को काफी प्रभावित किया है। एलपीजी (LPG) आयात में करीब 40% की गिरावट आई है, जिससे एलएनजी की उपलब्धता भी कम हो गई है। इस वजह से भारत को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं और रूस के डिस्काउंटेड ऑफर ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं। मार्च 2026 के पहले दो हफ्तों में कच्चे तेल का आयात बुरी तरह गिर गया था, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने के बाद सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे प्रमुख सप्लायर्स से लोडिंग बुरी तरह प्रभावित हुई थी।
सेंक्शन्स का खतरा और रूस की आर्थिक हालत
रूस की इस रणनीति में खरीदारों जैसे भारत के लिए बड़ा जोखिम है – अमेरिका से सेकेंडरी सेंक्शन्स (Secondary Sanctions) का खतरा। वाशिंगटन ने पहले भी रूसी ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर और ऐसे एंटिटीज पर सेंक्शन्स लगाए हैं जो मौजूदा उपायों को दरकिनार करने में मदद करते हैं। अमेरिका ने भारत से रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने का आग्रह भी किया है, क्योंकि यह मॉस्को के युद्ध को फंड करता है। फर्जी कागजात के साथ रूस से सेंक्शन्ड एलएनजी खरीदना खरीदारों के लिए भारी वित्तीय दंड और कूटनीतिक मुसीबतें खड़ी कर सकता है।
रूस की अपनी अर्थव्यवस्था भी अस्थिर है। जनवरी-मार्च 2026 की अवधि में देश को 4.58 ट्रिलियन रूबल (GDP का 1.9%) का बड़ा बजट डेफिसिट झेलना पड़ा। यूक्रेन के उसके एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर चल रहे हमलों ने स्थिति को और खराब कर दिया है, जो तेल उत्पादन के लिए खतरा हैं। रूसी अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि 2026 एक चुनौतीपूर्ण फाइनेंशियल ईयर साबित हो सकता है। यह आर्थिक कमजोरी रूस की लंबी अवधि तक बड़े डिस्काउंट देने की क्षमता को सीमित कर सकती है।
भविष्य में सप्लाई का मुकाबला
2026 में नॉर्थ अमेरिका, कतर और अन्य क्षेत्रों से सप्लाई में बड़ी वृद्धि की उम्मीद है। जहां मौजूदा सप्लाई रुकावटें फिलहाल रूस के लिए मौका बना रही हैं, वहीं गैर-प्रतिबंधित स्रोतों से सप्लाई बढ़ने पर रूस का दबदबा कम हो सकता है। इसके अलावा, कतर की एलएनजी फैसिलिटीज को हुआ नुकसान, हालांकि अभी सप्लाई टाइट कर रहा है, लेकिन उम्मीद है कि यह ठीक हो जाएगा और मीडियम टर्म में मार्केट में मुकाबला बढ़ाएगा। रूस का यह सेंक्शन्ड एलएनजी बेचने का प्रयास एक हाई-रिस्क मूव है, जो खरीदारों की ओर से शॉर्ट-टर्म प्राइस राहत के लिए बड़े भू-राजनीतिक और रेगुलेटरी रिस्क उठाने की इच्छा पर निर्भर करता है, न कि लंबी अवधि की स्थिरता और कंप्लायंस पर।