Renewable Power Projects: ग्रिड की दिक्कतें बनीं सिरदर्द, 60% तक पावर कट का खतरा!

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AuthorAditya Rao|Published at:
Renewable Power Projects: ग्रिड की दिक्कतें बनीं सिरदर्द, 60% तक पावर कट का खतरा!

भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर (Renewable Energy Sector) गंभीर ग्रिड बाधाओं से जूझ रहा है। पीक आवर्स (Peak Hours) के दौरान पावर कट (Power Curtailment) **60%** तक पहुंच गया है। जमीन अधिग्रहण और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) के विकास में देरी से प्रोजेक्ट की कमाई पर असर पड़ रहा है और देश के क्लीन एनर्जी लक्ष्यों को भी झटका लग रहा है।

ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय असर

भारत जिस तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) की ओर बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (Infrastructure Development) पिछड़ रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, कई सोलर (Solar) और विंड (Wind) प्रोजेक्ट्स के पास परमानेंट ट्रांसमिशन एक्सेस (Transmission Access) नहीं है, जिस कारण ग्रिड ऑपरेटर्स (Grid Operators) को पावर इनटेक (Power Intake) सीमित करना पड़ रहा है। पीक सोलर जेनरेशन (Peak Solar Generation) के घंटों के दौरान 60% तक पहुंचने वाले इस पावर कट (Power Curtailment) से रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स (Renewable Energy Developers) के रेवेन्यू (Revenue) और प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर सीधा असर पड़ रहा है।

पावर ट्रांसमिशन सेक्टर (Power Transmission Sector) को इस कमी को पूरा करने के लिए फाइनेंशियल ईयर 2026-27 से 2031-32 के बीच ₹5-6 लाख करोड़ के निवेश की जरूरत होगी। इस भारी-भरकम खर्च का मकसद मौजूदा ग्रिड को मजबूत करना और राजस्थान और गुजरात जैसे हाई-जेनरेशन एरिया (High-Generation Areas) को देश भर के लोड सेंटर्स (Load Centres) से जोड़ना है।

एग्जीक्यूशन और सप्लाई चेन की दिक्कतें

पैसों के अलावा, ट्रांसमिशन सेक्टर एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risks) से भी जूझ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रोजेक्ट्स में देरी आम बात है। टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग रूट (Tariff-based Competitive Bidding Route) के तहत अवॉर्डेड प्रोजेक्ट्स में औसत देरी 10 महीने से ज्यादा है। मार्च 2026 तक, ऐसे केवल 12% प्रोजेक्ट्स ही समय पर पूरे हो पाए थे। इन देरी के पीछे क्रिटिकल इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट (Critical Electrical Equipment) की सीमित मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी (Manufacturing Capacity) और स्किल्ड लेबर (Skilled Labour) की कमी जैसे सप्लाई-साइड प्रेशर (Supply-side Pressures) भी जिम्मेदार हैं।

रीजनल रिस्क और भविष्य के लिए जरूरी बातें

ग्रिड में देरी का असर पूरे भारत में एक जैसा नहीं है। जिन राज्यों में रिन्यूएबल एनर्जी का पेनिट्रेशन (Penetration) ज्यादा है, खासकर राजस्थान और गुजरात, वहां ज्यादा बार पावर कट हो रहा है, जिससे इन इलाकों में प्रोजेक्ट्स पर रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (Return on Investment) मुश्किल हो रहा है। निवेशकों के लिए, पावर डेवलपर्स की बिजली पैदा करने की क्षमता के साथ-साथ स्टेबल ग्रिड एक्सेस (Stable Grid Access) हासिल करने की काबिलियत भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

सबस्टेशन कैपेसिटी (Substation Capacity) के इजाफे की रफ्तार, जिसका लक्ष्य सालाना 120 GVA है, और 2035-36 तक 900 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी (Non-fossil Fuel Capacity) को इंटीग्रेट (Integrate) करने के राष्ट्रीय लक्ष्य का समर्थन करने के लिए हर साल 20,000 सर्किट किलोमीटर से ज्यादा ट्रांसमिशन लाइन्स (Transmission Lines) की सफल कमीशनिंग (Commissioning) जैसे फैक्टर्स पर नजर रखनी होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की इंफ्रास्ट्रक्चर पहलें मौजूदा देरी के चक्र को कम कर पाती हैं या नहीं और पावर कट को कितना कम कर पाती हैं, क्योंकि ये फैक्टर्स रिन्यूएबल एनर्जी एसेट्स (Renewable Energy Assets) की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी (Long-term Viability) और प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) तय करने में अहम होंगे।

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