इमर्जिंग मार्केट्स में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर को 2040 तक **$356 बिलियन** की जरूरत है, लेकिन हाई बॉरोइंग कॉस्ट इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन गई है।
हाई कॉस्ट और रिस्क का पेच
ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट्स में रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के सामने बड़ा वित्तीय टेस्ट है। $356 बिलियन की निवेश क्षमता होने के बावजूद, ऊंची ब्याज दरें और जोखिम की धारणा डेवलपर्स के लिए कैपिटल को महंगा बना रही है। ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट्स रिस्क डेटाबेस के अनुसार, 2006 से 2025 के बीच प्राइवेट सेक्टर लोंस का एवरेज लेंडिंग स्प्रेड 3.77% रहा, जबकि इन प्रोजेक्ट्स में नुकसान की दर केवल 0.9% थी। यह दिखाता है कि रिस्क प्रीमियम हकीकत से कहीं ज्यादा वसूला जा रहा है, जिससे डेवलपर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
भारत का मॉडल: कैसे बदली तस्वीर?
भारत ने बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के बकाया में बड़ी कटौती करके ग्लोबल स्तर पर मिसाल कायम की है। 2022 में जो बकाया $14.8 बिलियन था, वह फरवरी 2026 तक घटकर सिर्फ $433 मिलियन रह गया। इस वित्तीय अनुशासन के चलते भारत की सोलर कैपेसिटी 2010 के नगण्य स्तर से बढ़कर 2025 में 190GW के पार पहुंच गई है। आज भारत की कुल पावर कैपेसिटी 500GW है, जिसमें नॉन-फॉसिल फ्यूल का हिस्सा आधा है।
ब्लेंडेड फाइनेंस का रास्ता
नाइजीरिया, सेनेगल और मिस्र जैसे देशों में अभी भी पेमेंट रिलायबिलिटी और इंडस्ट्रियल डिमांड की कमी बड़ी समस्या बनी हुई है। इससे निपटने के लिए अब 'ब्लेंडेड फाइनेंस' मॉडल पर जोर दिया जा रहा है। भारत ने $944.5 मिलियन का 'ग्रीन ग्रोथ फंड' और नाइजीरिया ने $188 मिलियन की सुविधा शुरू की है। निवेशकों के लिए अब बड़ी चुनौती यह देखना है कि क्या कंपनियां बढ़ती ब्याज दरों और भुगतान के अनिश्चित माहौल के बीच अपने मार्जिन को बरकरार रख पाती हैं या नहीं।
