भारत ने अपने न्यूक्लियर पावर सेक्टर को प्राइवेट खिलाड़ियों के लिए खोल दिया है। 2025 Nuclear Energy Mission के तहत अब Pranos Fusion और Big Bang Boom जैसी स्टार्टअप्स फ्यूजन और माइक्रो-रिएक्टर्स पर काम कर रही हैं, लेकिन इसमें भारी निवेश जोखिम भी शामिल हैं।
भारत अब दशकों पुराने सरकारी एकाधिकार वाले न्यूक्लियर एनर्जी मॉडल से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में आए SHANTI Act और ₹20,000 करोड़ के Nuclear Energy Mission के जरिए सरकार ने प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रित किया है। इसका लक्ष्य 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल करना है।
कौन सी कंपनियां हैं रेस में?
बेंगलुरु स्थित Pranos Fusion एक कॉम्पैक्ट टोकामक डिवाइस पर काम कर रही है, जो 2027 तक प्लाज्मा इग्निशन का लक्ष्य रखती है। वहीं, हैदराबाद की Anubal प्लाज्मा ऑप्टिक्स पर ध्यान केंद्रित कर रही है। दूसरी ओर, Big Bang Boom 1–10 MW रेंज के माइक्रो-मॉड्यूलर फिक्शन रिएक्टर्स बना रही है, जो डेटा सेंटर्स और रिमोट इंडस्ट्रियल साइट्स के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा मौका
फ्यूजन तकनीक में समय लगेगा, लेकिन मौजूदा मैन्युफैक्चरर्स के लिए कमाई के रास्ते अभी खुल गए हैं। Unimech Aerospace and Manufacturing ने Nuclear Power Corporation of India से ₹87 करोड़ का ऑर्डर हासिल किया है, जो इस बात का सबूत है कि सप्लाई चेन में अभी से अवसर मौजूद हैं।
निवेशकों के लिए सावधानी
यह कोई साधारण स्टार्टअप सेक्टर नहीं है। एक माइक्रो-रिएक्टर बनाने की लागत ₹1,000 करोड़ प्रति यूनिट तक हो सकती है। इसके अलावा, रेगुलेटरी चुनौतियां, सख्त सेफ्टी ऑडिट और लायबिलिटी कानून बड़े बैरियर हैं। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि कौन सी कंपनी लंबी अवधि की फंडिंग जुटा पाती है और सरकारी नियामक ढांचे के बीच अपने प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक पूरा कर पाती है।
