फ्यूजन एनर्जी में भारत का बड़ा कदम: Pranos Fusion को मिली ₹63 करोड़ की फंडिंग
भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप Pranos Fusion ने अपने फ्यूजन टेक्नोलॉजी के विकास को तेज़ी देने के लिए एक महत्वपूर्ण फंडिंग राउंड पूरा किया है। कंपनी ने शुरुआती चरण की फंडिंग में $6.8 मिलियन (करीब ₹63 करोड़) की राशि जुटाई है। इस राउंड का सह-नेतृत्व प्रमुख वेंचर कैपिटल फर्म pi Ventures और Ankur Capital ने किया है। मौजूदा निवेशक Industrial47 के साथ-साथ Groww के को-फाउंडर Lalit Keshre और Razorpay के संस्थापकों जैसे एंजल इन्वेस्टर्स (Angel Investors) ने भी इसमें भाग लिया है।
2026 तक 'फर्स्ट प्लाज्मा' का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
Pranos Fusion इस जुटाए गए फंड का इस्तेमाल अपनी फ्यूजन टेक्नोलॉजी को तेज़ करने के लिए करेगी। कंपनी का सबसे बड़ा लक्ष्य 2026 तक एक टोकामैक (tokamak) को चालू करना और "फर्स्ट प्लाज्मा" (first plasma) हासिल करना है। यह फंड मैग्नेट सिस्टम (magnet systems) को बेहतर बनाने, सॉफ्टवेयर कंट्रोल्स (software controls) विकसित करने, टीम का विस्तार करने और परीक्षण सुविधाओं (testing facilities) को मज़बूत करने में इस्तेमाल किया जाएगा।
फ्यूजन एनर्जी में ग्लोबल निवेश और भारत की भूमिका
Pranos Fusion की यह फंडिंग वैश्विक स्तर पर फ्यूजन एनर्जी सेक्टर में बढ़ते निवेश के रुझान को दर्शाती है। पिछले एक साल में इस सेक्टर में $2.6 बिलियन से ज़्यादा का निवेश हुआ है, और ग्लोबल प्राइवेट फ्यूजन कंपनियों ने कुल मिलाकर $9.7 बिलियन से अधिक की राशि जुटाई है। भारत भी ITER प्रोजेक्ट में एक महत्वपूर्ण पार्टनर के तौर पर शामिल है, जहाँ वह क्रायोस्टैट (cryostat) जैसे अहम कंपोनेंट्स की सप्लाई कर रहा है। गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) भारत के फ्यूजन साइंस प्रयासों का नेतृत्व कर रहा है। Pranos Fusion का विकास IPR और Jawaharlal Nehru Centre for Advanced Scientific Research (JNCASR) के सह-इनक्यूबेशन (co-incubation) का नतीजा है, जो इसे एडवांस्ड साइंस और विशेष विशेषज्ञता का आधार प्रदान करता है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि $6.8 मिलियन एक शुरुआती चरण की कंपनी के लिए बड़ी रकम है, लेकिन फ्यूजन डेवलपमेंट के लिए ज़रूरी कुल पूंजी के मुकाबले यह एक छोटा हिस्सा है। इंडस्ट्री को पायलट प्लांट (pilot plants) शुरू करने के लिए अनुमानित $77 बिलियन की ज़रूरत होगी, जिससे एक बड़ा फंडिंग गैप (funding gap) साफ दिखता है। 2026 तक फर्स्ट प्लाज्मा का लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी है, खासकर जब ITER जैसे बड़े इंटरनेशनल प्रोजेक्ट में 2033-2034 तक फर्स्ट प्लाज्मा और 2039 तक ड्यूटेरियम-ट्रिटियम (deuterium-tritium) ऑपरेशन की उम्मीद है। प्लाज्मा को अत्यधिक उच्च तापमान पर बनाए रखना, मज़बूत मटेरियल (materials) विकसित करना और नेट एनर्जी गेन (net energy gain) हासिल करना जैसी प्रमुख वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। Pranos Fusion की शुरुआती फंडिंग एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन उसकी लंबी अवधि की सफलता इन तकनीकी बाधाओं को पार करने और कॉमर्शियल वायबिलिटी (commercial viability) हासिल करने के लिए भविष्य में महत्वपूर्ण निवेश जुटाने पर निर्भर करेगी।
