भारत के पावर सेक्टर में बंपर तेजी! Macquarie ने NTPC और JSW Energy को बताया टॉप पिक, जानें क्यों

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत के पावर सेक्टर में बंपर तेजी! Macquarie ने NTPC और JSW Energy को बताया टॉप पिक, जानें क्यों

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ग्लोबल ब्रोकरेज Macquarie का भारत के पावर सेक्टर पर बड़ा दांव! रिकॉर्ड ऊर्जा मांग और बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार के बीच, ब्रोकरेज फर्म ने NTPC और JSW Energy को अपनी टॉप पिक्स बताया है।

क्या है ख़ास?

ग्लोबल ब्रोकरेज हाउस Macquarie ने भारत के पावर सेक्टर पर एक बड़ी रिपोर्ट जारी की है, जिसमें आने वाले समय में इस सेक्टर में ज़बरदस्त ग्रोथ की भविष्यवाणी की गई है। Macquarie का मानना है कि पावर जनरेशन कैपेसिटी बढ़ाने और ग्रिड को मॉडर्न बनाने की दिशा में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आ रहा है। इस रिपोर्ट के तहत, Macquarie ने NTPC को सेक्टर का 'टॉप पिक' घोषित किया है, जबकि JSW Energy को 'आउटपरफॉर्म' रेटिंग दी गई है। इस एनालिसिस में Power Grid Corporation, Adani Green Energy, Adani Power, और Adani Energy Solutions जैसी बड़ी कंपनियों का भी ज़िक्र है।

कोयला और रिन्यूएबल का मिश्रण

भारत का पावर सेक्टर अब एक दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। एक तरफ कोयला 'राउंड-द-क्लॉक' पावर सप्लाई सुनिश्चित कर रहा है, जो स्थिरता के लिए बेहद ज़रूरी है, खासकर तब जब रिन्यूएबल एनर्जी की सप्लाई कम हो। वहीं दूसरी तरफ, रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी में भी तेज़ी से विस्तार हो रहा है। Macquarie के अनुमान के मुताबिक, FY32 तक कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी लगभग 538 GW से बढ़कर 900 GW के करीब पहुंच जाएगी।

एनर्जी स्टोरेज की बड़ी ज़रूरत

इस ग्रोथ के लिए एनर्जी स्टोरेज बहुत अहम है। सौर और पवन ऊर्जा की अनियमितता को संभालने के लिए, भारत को लगभग 74 GW एनर्जी स्टोरेज कैपेसिटी की ज़रूरत होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि शाम के समय, जब सूरज की रोशनी कम हो जाती है, तब ऊर्जा की मांग अपने चरम पर होती है। इस अंतर को स्टोरेज सॉल्यूशन से ही भरा जा सकता है।

ट्रांसमिशन पर फोकस

Macquarie की रिपोर्ट के अनुसार, पावर सेक्टर की अगली ग्रोथ ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च से तय होगी। रिन्यूएबल एनर्जी से भरपूर राज्यों और इंडस्ट्रियल हब्स के बीच दूरी एक बड़ी चुनौती है। इसे पाटने के लिए, 2035-36 तक ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर अनुमानित $51 बिलियन खर्च होने की उम्मीद है। जनरेशन प्रोजेक्ट्स के मुकाबले, बड़े ट्रांसमिशन नेटवर्क बनाने में ज़्यादा समय लगता है, जो 36 से 48 महीने तक चल सकता है। इसलिए, इन नेटवर्क्स की प्लानिंग पहले से ही शुरू करनी होगी।

डिस्कॉम्स की फाइनेंशियल रिकवरी

पावर खरीदने और ग्राहकों को बेचने वाली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां (डिस्कॉम्स) भी अब फाइनेंशियली बेहतर स्थिति में दिख रही हैं। सरकारी स्कीमों और स्मार्ट मीटरों के इस्तेमाल से घाटा कम हुआ है। एग्रीगेट टेक्निकल और कमर्शियल (AT&C) लॉस, जो पहले 22% के करीब था, अब घटकर लगभग 15% पर आ गया है। यह पूरे सेक्टर के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि इससे पावर जेनरेटर्स को समय पर पेमेंट मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है।

जोखिम और चुनौतियाँ

हालांकि सेक्टर का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी नज़र रखनी चाहिए। सबसे बड़ी चुनौती बड़े प्रोजेक्ट्स का एग्जीक्यूशन है। ट्रांसमिशन की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। अगर ग्रिड पावर को तेज़ी से ट्रांसमिट नहीं कर पाता, तो पावर कर् शामिल हो सकता है। इसके अलावा, ज़मीन अधिग्रहण, फॉरेस्ट क्लीयरेंस और हाई-वोल्टेज नेटवर्क के लिए ज़रूरी ग्लोबल कंपोनेंट्स की उपलब्धता में देरी हो सकती है। कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव और जियोपॉलिटिकल रिस्क भी ऑपरेशनल कॉस्ट को प्रभावित कर सकते हैं।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को एग्जीक्यूशन पर ध्यान देना चाहिए। नई ट्रांसमिशन लाइनों की कमीशनिंग की रफ़्तार, एनर्जी स्टोरेज की तैनाती और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी जैसे मुद्दे अहम रहेंगे। सेक्टर कोयले पर अपनी निर्भरता और रिन्यूएबल एनर्जी के तेज़ी से विस्तार के बीच कैसे संतुलन बनाता है, यही इसकी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ और प्रॉफिटेबिलिटी की असली परीक्षा होगी।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.