Power Ministry ने जमीन के मुआवजे (Land Compensation) को लेकर एक नया और स्टैंडर्ड ढांचा तैयार किया है। इसका मकसद 'Right of Way' से जुड़े विवादों को खत्म करना है, जो अक्सर इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन लाइनों के काम को रोक देते हैं।
विवादों पर लगेगा लगाम
भारत के एनर्जी सेक्टर में 'Right of Way' (RoW) विवाद एक बड़ी बाधा रहे हैं। अक्सर जमीन मालिकों और ट्रांसमिशन कंपनियों के बीच जमीन की कीमतों पर सहमति न बन पाने के कारण प्रोजेक्ट्स महीनों या सालों तक ठप रहते हैं। अब सरकार ने एक स्टैंडर्ड फ्रेमवर्क लागू किया है, जिससे यह तय होगा कि जब मार्केट रेट सरकारी 'सर्कल रेट' से ज्यादा हो, तो मुआवजा कैसे तय किया जाए।
कैसे काम करेगी वैल्यूएशन प्रक्रिया?
विवाद होने पर अब 'मार्केट रेट कमेटी' (MRC) का गठन होगा, जिसकी अगुवाई डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट करेंगे। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए, कमेटी Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) के पैनल से 3 स्वतंत्र वैल्युअर्स को चुनेगी। यह तरीका कानूनी उलझनों को कम करेगा और कंपनियों को टावर और कॉरिडोर बनाने के लिए जमीन मिलने का रास्ता साफ होगा।
कंपनियों और निवेशकों के लिए मायने
Power Grid Corporation of India जैसी ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) के लिए समय बहुत कीमती है। प्रोजेक्ट्स में देरी से लागत बढ़ती है और रेवेन्यू आता नहीं है। यह नया सिस्टम PM-DHARA स्कीम के तहत रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बनाने में मदद करेगा। समय पर प्रोजेक्ट पूरा होने का सीधा फायदा कंपनियों के मुनाफे और निवेशकों के रिटर्न पर दिखेगा।
रेगुलेटरी रिस्क और चुनौतियां
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि मुआवजा अगर बजट से ज्यादा हुआ, तो शुरुआती बोझ कंपनियों पर ही पड़ेगा। हालांकि, वे Central Electricity Regulatory Commission (CERC) के पास 'Change in Law' के तहत इसे क्लेम कर सकती हैं, लेकिन इसमें समय लग सकता है। साथ ही, जमीन राज्यों का विषय है, इसलिए यह देखना होगा कि राज्य सरकारें इसे कितनी तत्परता से लागू करती हैं। आने वाली तिमाहियों में CERC के फैसलों और प्रोजेक्ट्स की स्पीड पर नजर रखना निवेशकों के लिए जरूरी होगा।
