भारत को 2032 तक रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) को सपोर्ट करने के लिए पावर ट्रांसमिशन (Power Transmission) में ₹5-6 लाख करोड़ के निवेश की ज़रूरत है। लेकिन, ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) और प्रोजेक्ट्स में लगातार हो रही देरी डेवलपर्स के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर रही है। डेटा दिखाता है कि हालिया प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive-bid) वाले प्रोजेक्ट्स में से सिर्फ **12%** ही समय पर पूरे हुए, जिससे बिजली पहुंचाने में दिक्कतें आ रही हैं।
पावर ग्रिड को चाहिए ₹6 लाख करोड़ का बूस्टर
भारत अपनी पावर ट्रांसमिशन ग्रिड के बड़े विस्तार के लिए तैयार है। अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2027 से 2032 के बीच ₹5-6 लाख करोड़ का बड़ा कैपिटल स्पेंड (Capital Spend) ज़रूरी होगा। यह कदम रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी को संभालने के लिए अहम है। सरकार का लक्ष्य 2035-36 तक 900 GW से ज़्यादा नॉन-फॉसिल फ्यूल (Non-fossil fuel) क्षमता को इंटीग्रेट (Integrate) करना है। इसे हासिल करने के लिए, देश को अगले छह सालों में हर साल लगभग 20,000 सर्किट किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइनें और 120 GVA सबस्टेशन क्षमता (Substation Capacity) बढ़ानी होगी।
ऑर्डर बुक्स बढ़ीं, पर एग्जीक्यूशन (Execution) पर सवाल?
इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) निर्माण में अपेक्षित तेज़ी, ट्रांसमिशन इक्विपमेंट (Transmission Equipment) बनाने वालों की ऑर्डर बुक्स में दिखने लगी है। ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) के लिए ऑर्डर इनफ्लो (Order Inflow) FY22 से दोगुना से ज़्यादा हो गया है। हालाँकि, रेटिंग एजेंसी ICRA ने आगाह किया है कि इस सेक्टर में सप्लाई की दिक्कतें (Supply Constraints) हैं। कुशल मजदूरों (Skilled Labour) की कमी और ज़रूरी इक्विपमेंट की सीमित मैन्युफैक्चरिंग क्षमता प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में रुकावट बन सकती है।
प्रोजेक्ट्स में देरी और डेवलपर्स पर असर
लंबे समय की संभावनाओं के बावजूद, प्रोजेक्ट्स को पूरा करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स अक्सर ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) के मुद्दे, राइट-ऑफ-वे (Right-of-way) विवादों और धीमी रेगुलेटरी अप्रूवल (Regulatory Approvals) की वजह से अटक जाते हैं। टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (Tariff-based competitive bidding) रूट से दिए गए प्रोजेक्ट्स की समीक्षा से पता चलता है कि मार्च 2026 तक केवल 12% ही तय समय पर पूरे हुए थे। औसतन, देरी वाले प्रोजेक्ट्स ने अपनी डेडलाइन 10 महीने ज़्यादा लीं, कुछ तो 3 साल तक खिंच गईं।
इन देरी से रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स (Renewable Energy Developers) को सीधा खतरा है। जब ट्रांसमिशन लाइनें समय पर तैयार नहीं होतीं, तो जेनरेट हुई बिजली ग्रिड तक नहीं पहुँच पाती। इससे पावर कटेलमेंट (Curtailment) होता है, जहाँ जेनरेटर्स को अपना उत्पादन कम करना पड़ता है। यह समस्या खासतौर पर राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में ज़्यादा गंभीर है, जहाँ रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में भारी बढ़ोतरी हुई है। मई 2026 तक, अस्थायी एक्सेस रूट्स (Temporary access routes) पर निर्भर रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स को पीक आवर्स (Peak hours) के दौरान काफी कटेलमेंट का सामना करना पड़ रहा है, जो कभी-कभी 50% से 60% तक पहुँच जाता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, FY27 और FY31 के बीच प्लान किए गए 107 GW रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का सफल एकीकरण (Integration) ग्रिड की तैयारी पर बहुत हद तक निर्भर करेगा। निवेशकों को इन ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स की कंमीशनिंग टाइमलाइन (Commissioning timelines) पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि कोई भी और देरी रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स के फाइनेंशियल परफॉरमेंस (Financial Performance) को नुकसान पहुँचा सकती है। इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स की क्षमता बढ़ाने और रॉ मटेरियल (Raw material) की लागत को मैनेज करने की क्षमता भी पूरे सेक्टर में प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
