पॉलिसी पर चर्चा के लिए मिला ज्यादा वक्त
ऊर्जा मंत्रालय ने स्टेकहोल्डर्स को ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 पर अपनी राय देने के लिए 19 मार्च तक का अतिरिक्त समय दिया है। यह फैसला कई तरफ से आई उन मांगों के बाद लिया गया है, जिनमें पॉलिसी के दूरगामी असर वाले रिफॉर्म्स, खासकर टैरिफ और डिस्कॉम्स के वित्तीय मुद्दों पर और गहराई से विचार करने की गुजारिश की गई थी। इस बीच, 2 मार्च 2026 तक BSE पावर इंडेक्स 6858.42 पर ट्रेड कर रहा था, जो सेक्टर में रेगुलेटरी डेवलपमेंट और इम्प्लीमेंटेशन रिस्क को लेकर बाजार की संवेदनशीलता को दर्शाता है। पूरे पावर सेक्टर का कुल मार्केट कैप लगभग ₹20.9 लाख करोड़ है, जो इन प्रस्तावित बदलावों के बड़े आर्थिक महत्व को बताता है।
डिस्कॉम्स की वित्तीय सेहत और पॉलिसी के वादे
यह ड्राफ्ट पॉलिसी भारत के पावर सेक्टर को नए सिरे से खड़ा करने का लक्ष्य रखती है, खासकर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की गहरी वित्तीय समस्याओं को दूर करने पर जोर देती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मार्च 2024 तक इन डिस्कॉम्स पर कुल ₹7.42 लाख करोड़ का बकाया कर्ज था। यह कर्ज़ एक लगातार बनी हुई चुनौती है, जिसके चलते सरकार को कई बार बेलआउट पैकेज देने पड़े हैं। UDAY और RDSS जैसी पिछली योजनाएं भी इन स्ट्रक्चरल इनएफिशिएंसीज़ को पूरी तरह दूर करने में सीमित सफल रहीं। नई पॉलिसी में कॉस्ट-रिफ्लेक्टिव टैरिफ को अनिवार्य बनाने और क्रॉस-सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करने का प्रस्ताव है, ताकि बिजली की सप्लाई लागत और कंज्यूमर से वसूले जाने वाले टैरिफ के बीच के अंतर को खत्म किया जा सके। इसमें एक खास प्रावधान यह भी है कि अगर रेगुलेटरी कमीशन समय पर आदेश जारी नहीं करते, तो टैरिफ में ऑटोमैटिक रिवीजन हो सकेगा, जिससे यूटिलिटीज के रेवेन्यू की स्टेबिलिटी सुनिश्चित होगी।
सेक्टर के दिग्गज और भविष्य की राह
सेक्टर के प्रमुख खिलाड़ियों की वैल्यूएशन्स भी अलग-अलग हैं। मार्च 2026 तक NTPC का P/E रेश्यो लगभग 15.14 से 25.54 के बीच रहा और मार्केट कैप करीब ₹3.66 लाख करोड़ था। Power Grid Corporation का P/E करीब 16.76 से 18.61 और मार्केट कैप लगभग ₹2.76 लाख करोड़ था। Tata Power का P/E 26.32 से 32.02 के बीच रहा, जिसका मार्केट कैप करीब ₹1.17 से ₹1.21 लाख करोड़ था, जबकि Adani Power का P/E 20.8 से 24.54 के बीच और मार्केट कैप लगभग ₹2.66 से ₹2.76 लाख करोड़ था। पॉलिसी रिन्यूएबल एनर्जी के इंटीग्रेशन और ग्रिड रेजिलिएंस को बेहतर बनाने पर जोर देती है। साथ ही, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) जैसे न्यूक्लियर पावर पर भी फोकस है, जो भारत के एनर्जी मिक्स में एक बड़ा स्ट्रेटेजिक बदलाव दिखाता है। अगले पांच सालों में इलेक्ट्रिसिटी डिमांड में सालाना 6–6.5% की अनुमानित ग्रोथ के साथ, अगले दशक में लगभग ₹40 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट ऑपर्चुनिटी की उम्मीद है।
सुधारों के रास्ते में आने वाली चुनौतियाँ
पॉलिसी के नेक इरादों के बावजूद, इसके इम्प्लीमेंटेशन में बड़ी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। कमेंट पीरियड का बढ़ना इस बात का संकेत है कि कुछ महत्वपूर्ण रिफॉर्म्स, खासकर टैरिफ एडजस्टमेंट को लेकर विरोध हो सकता है, जिससे कंज्यूमर्स या राज्यों पर बोझ पड़ सकता है या वे बिजली की कीमतें बढ़ाने की पॉलिटिकल कीमत चुकाने से कतरा सकते हैं। देश भर में एग्रीगेट टेक्निकल और कमर्शियल (AT&C) लॉसेस का उच्च स्तर, जो राष्ट्रीय स्तर पर 15-19% है (जबकि यूके और यूएस जैसे देशों में यह 6-7% है), एक बड़ा आर्थिक नुकसान है। इसके अलावा, पिछली असफल बेलआउट और रीस्ट्रक्चरिंग स्कीम्स का इतिहास बताता है कि डिस्कॉम्स अभी भी गहरी ऑपरेशनल इनएफिशिएंसीज़ और पॉलिटिकल इंटरफेरेंस से जूझ रहे हैं। राज्यों द्वारा सब्सिडी का समय पर भुगतान न करना और वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए हाई-कॉस्ट शॉर्ट-टर्म लोंस पर निर्भरता इन यूटिलिटीज की नाजुक वित्तीय स्थिति को और बढ़ाती है। पॉलिसी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह जवाबदेही कैसे तय करती है और उन सिस्टमिक इश्यूज को कैसे दूर करती है जिन्होंने पिछले सुधार प्रयासों को कमजोर किया है।
भविष्य की ओर
ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026, कमेंट पीरियड के विस्तार के बावजूद, एनालिस्ट्स द्वारा भारतीय पावर सेक्टर के लिए स्ट्रक्चरली पॉजिटिव मानी जा रही है। कॉस्ट-रिफ्लेक्टिव टैरिफ, क्रॉस-सब्सिडी में कमी और मार्केट-बेस्ड मैकेनिज्म पर इसका फोकस पेमेंट डिसिप्लिन और प्रोजेक्ट बैंकबिलिटी में सुधार की उम्मीद जगाता है। रिन्यूएबल एनर्जी के लिए लॉन्ग-टर्म प्लानिंग और ग्रिड की तैयारी पर जोर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन (T&D) में भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) को बढ़ावा देगा, जो सेक्टर के लिए सरकार के बड़े इन्वेस्टमेंट टारगेट्स के अनुरूप है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इन प्रस्तावित बदलावों के प्रभावी इम्प्लीमेंटेशन और भारत के विशाल पावर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में सुधार की जटिल पॉलिटिकल, इकोनॉमिक और ऑपरेशनल चुनौतियों से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगा।