सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। अगस्त तक LPG पर अंडर-रिकवरी का आंकड़ा **₹62,000 करोड़** के पार पहुंच गया है। महंगे अमेरिकी आयात और शिपिंग खर्च के चलते प्रति सिलेंडर नुकसान **₹210** तक पहुंच गया है।
देश की सरकारी तेल कंपनियों—IOCL, BPCL और HPCL—के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। LPG की खरीद लागत और रिटेल दाम के बीच का अंतर, जिसे हम 'अंडर-रिकवरी' कहते हैं, अगस्त 2026 तक ₹62,000 करोड़ को पार कर चुका है।\n\n### समस्या की जड़ क्या है?\n\nफरवरी 2026 में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के बंद होने के बाद भारत को अपनी सप्लाई चेन बदलनी पड़ी। अब भारत, पश्चिमी एशिया के बजाय अमेरिका से LPG मंगा रहा है। इससे सप्लाई तो सुरक्षित है, लेकिन लॉजिस्टिक्स का खर्च काफी बढ़ गया है। ह्यूस्टन से एशिया के बीच Very Large Gas Carriers (VLGC) का किराया $300 प्रति टन से ऊपर निकल गया है। साथ ही, सऊदी कॉन्ट्रैक्ट कीमतों में उछाल ने भी तेल कंपनियों की कमर तोड़ दी है।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\n\nनिवेशकों की मुख्य चिंता यह है कि क्या यह घाटा कंपनियों के मुनाफे यानी बॉटम लाइन पर असर डालेगा। इतिहास गवाह है कि सरकार ऐसी स्थितियों में बजट से सपोर्ट देती है या ONGC और Oil India जैसी कंपनियों पर बोझ साझा करने का दबाव डालती है। लेकिन अगर सरकार से मिलने वाले इस मुआवजे में देरी होती है, तो कंपनियों के फाइनेंशियल हेल्थ पर असर पड़ना तय है।\n\nफिलहाल, मार्केट की नजरें सरकारी सब्सिडी घोषणाओं पर टिकी हैं। साथ ही, पेट्रोल और डीजल के मार्जिन पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि LPG का घाटा इन्हीं से बैलेंस किया जाता है। आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स में मार्जिन पर दबाव साफ नजर आ सकता है, इसलिए एक्सपर्ट्स शिपिंग रेट्स और ग्लोबल LPG प्राइस ट्रेंड्स पर कड़ी नजर रख रहे हैं।
