सरकार ने PM-KUSUM 2.0 योजना के लिए **₹50,000 करोड़** का बजट आवंटित किया है, जो अब एग्रीवोल्टिक्स (agrivoltaics) पर केंद्रित है। किसानों के लिए यह ऊर्जा बचत का बड़ा मौका है, लेकिन इसकी सफलता नई और ऊंची सोलर संरचनाओं और पंप इलेक्ट्रॉनिक्स की मजबूती पर टिकी है।
भारत अपने सोलर-पावर्ड एग्रीकल्चर विजन को आगे बढ़ाते हुए PM-KUSUM प्रोग्राम के अगले चरण में प्रवेश कर चुका है। ₹50,000 करोड़ के बजट के साथ, अब फोकस 'एग्रीवोल्टिक्स' पर है—एक ऐसा सिस्टम जहां सोलर पैनल और फसलें एक ही जमीन पर साथ-साथ होती हैं। यह सिर्फ एक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन कंपनियों के लिए नई तकनीकी चुनौतियां लेकर आया है जो इन सोलर सिस्टम्स को तैयार करती हैं।
नई इंजीनियरिंग चुनौतियां
पारंपरिक सोलर फार्म जमीन के काफी करीब होते हैं, लेकिन एग्रीवोल्टिक सिस्टम में पैनल को 4 से 5 मीटर की ऊंचाई पर लगाना पड़ता है। यह ऊंचाई इसलिए जरूरी है ताकि पैनल के नीचे ट्रैक्टर और कृषि मशीनें आसानी से चल सकें। इस बदलाव के कारण अधिक स्टील, कॉम्प्लेक्स पाइलिंग और मजबूत नींव की आवश्यकता होती है ताकि यह सिस्टम हवा के दबाव को झेल सके। इंजीनियरिंग फर्मों के लिए अब चुनौती 25 साल तक टिकने वाली संरचनाएं बनाने की है।
रिलायबिलिटी और मेंटेनेंस (Reliability and Maintenance)
सोलर इरिगेशन का सबसे अहम हिस्सा 'पंप कंट्रोलर' है। अब इंडस्ट्री का ध्यान पुराने और फेल होने वाले कंपोनेंट्स की जगह 'एडवांस्ड सेंसरलेस टेक्नोलॉजी' पर शिफ्ट हो रहा है। यदि ये इलेक्ट्रॉनिक्स फेल होते हैं, तो किसानों की फसल पर सीधा असर पड़ता है। Ministry of New and Renewable Energy (MNRE) द्वारा घरेलू स्तर पर प्रमाणित सोलर सेल्स को अनिवार्य करने के बाद, मैन्युफैक्चरर्स को क्वालिटी और ड्यूरेबिलिटी के बीच तालमेल बिठाना होगा।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
हरियाणा जैसे क्षेत्रों के आंकड़े बताते हैं कि सोलर पंप से किसान हर साल लगभग ₹55,000 की बचत कर सकते हैं (महंगे डीजल की खपत कम करके)। हालांकि, निवेशकों के लिए असली कहानी केवल सरकारी कॉन्ट्रैक्ट के साइज में नहीं है। असली वैल्यू उस कंपनी में है जो रिमोट इलाकों में भी इक्विपमेंट का बेहतर मेंटेनेंस और अपटाइम सुनिश्चित कर सके। भविष्य में वही कंपनियां सफल होंगी जो सिर्फ वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय, टिकाऊ और भरोसेमंद सिस्टम डिलीवर करेंगी।
