सरकार PM-KUSUM 2.0 स्कीम के अगले चरण को लेकर बड़े बदलावों की तैयारी कर रही है। **₹51,000 करोड़** के प्रस्तावित आउटले के साथ, अब फोकस ग्रिड रेडीनेस और डेवलपर्स के लिए पेमेंट सिक्योरिटी पर शिफ्ट हो रहा है ताकि प्रोजेक्ट्स की विजिबिलिटी बेहतर हो सके।
चुनौती और हकीकत
PM-KUSUM के पहले चरण ने स्टैंड-अलोन सोलर पंपों के मामले में 90% लक्ष्य हासिल कर बड़ी कामयाबी दर्ज की थी, लेकिन ग्रिड-कनेक्टेड सोलर प्लांट्स की राह उतनी आसान नहीं रही। इसके तहत 10,000 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले केवल 2,400 मेगावाट का काम पूरा हो पाया है। इस सुस्ती के पीछे राज्य स्तरीय एजेंसियों और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (Discoms) के बीच तालमेल की कमी और जमीन अधिग्रहण जैसी बड़ी रुकावटें रही हैं।
पेमेंट सिक्योरिटी और रिफॉर्म्स
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के जानकारों का मानना है कि इस सेक्टर में सबसे बड़ी समस्या डिसकॉम्स की तरफ से पेमेंट में होने वाली देरी है। बिना कड़े पेमेंट सिक्योरिटी अरेंजमेंट्स के, प्राइवेट सेक्टर का भरोसा बनाए रखना मुश्किल है। PM-KUSUM 2.0 में अब सख्त बिलिंग टाइमलाइन पर जोर दिया जा रहा है, ताकि डेवलपर्स को उनका रेवेन्यू समय पर मिले और प्रोजेक्ट्स लंबे समय तक टिक सके।
एग्रीवोल्टिक्स (Agrivoltaics) का नया दौर
आगामी चरण में सरकार 'एग्रीवोल्टिक्स' मॉडल को प्रमोट कर रही है, जहां एक ही जमीन पर सोलर पावर भी जनरेट होगी और खेती भी की जा सकेगी। इससे किसानों की इनकम के दो जरिये बनेंगे। हालांकि, इसमें पानी के मैनेजमेंट पर भी बारीक नजर रखनी होगी ताकि सोलर पंपों के अधिक इस्तेमाल से ग्राउंड-वॉटर लेवल न गिरे। निवेशकों की नजर अब इस पर टिकी है कि फाइनल पॉलिसी फ्रेमवर्क में पेमेंट सिक्योरिटी को लेकर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
