स्टॉकपाइल्स का अंबार और जियोपॉलिटिकल टेंशन
दुनियाभर के कच्चे तेल (Crude Oil) बाजार में इस वक्त सप्लाई का जबरदस्त सरप्लस और बढ़ता हुआ भू-राजनीतिक तनाव, दोनों का असर दिख रहा है। अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के मुताबिक, 20 फरवरी 2026 को खत्म हुए हफ्ते में अमेरिका में कच्चे तेल का भंडार (crude inventories) 159.89 लाख बैरल यानी करीब 160 लाख बैरल बढ़ गया। यह पिछले करीब 3 सालों में एक हफ्ते में हुई सबसे बड़ी बढ़ोतरी है, जिसने मार्केट एनालिस्ट्स की उम्मीदों (जो 15 से 19 लाख बैरल बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे थे) को कहीं पीछे छोड़ दिया। इस भारी भरकम इजाफे की वजह से कुल कमर्शियल इन्वेंटरी करीब 43.58 करोड़ बैरल तक पहुंच गई। इसी दौरान रिफाइनरी का इस्तेमाल (utilization) गिरकर 88.6% पर आ गया, जो इस अतिरिक्त सप्लाई को संभालने में और मुश्किलें पैदा कर रहा है। आमतौर पर, इतनी ज्यादा सप्लाई कीमतों पर भारी गिरावट का दबाव बनाती है।
ईरान-अमेरिका डिप्लोमेसी का गेम
इन सब बियरिश (bearish) यानी मंदी वाले संकेतों के बावजूद, कच्चे तेल की कीमतें एक बड़े जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम (risk premium) के चलते सपोर्ट पा रही हैं। यह प्रीमियम अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में शुरू हुई परमाणु वार्ता (nuclear talks) की वजह से है। ING के एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर इन वार्ताओं का कोई सकारात्मक नतीजा निकलता है, तो मार्केट में पहले से मौजूद $10 प्रति बैरल का प्रीमियम धीरे-धीरे खत्म हो सकता है। वहीं, अगर बातचीत फेल हुई, तो कीमतें ऊपर जा सकती हैं। हालांकि, मार्केट तब तक पूरी प्रतिक्रिया नहीं देगा जब तक अमेरिका की संभावित कार्रवाई का दायरा साफ न हो जाए। अमेरिका की सेना मध्य पूर्व (Middle East) में तैनात है, और ईरान की जवाबी कार्रवाई की धमकी ने चिंताएं बढ़ा दी हैं, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल प्रवाह बाधित होने का खतरा। इसी अनिश्चितता के बीच, बड़े क्रूड ऑयल कैरियर्स (VLCCs) के लिए शिपिंग की लागत $2 लाख डॉलर प्रतिदिन से ऊपर चली गई है, जो 2020 के बाद का उच्चतम स्तर है।
मंदी का स्पष्ट संकेत (Forensic Bear Case)
रिकॉर्ड इन्वेंटरी बिल्ड और डिप्लोमेटिक दांव-पेंच का यह मेल कीमतों के लिए एक स्पष्ट मंदी का संकेत दे रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका की संभावित प्रतिक्रियाओं ने भले ही मार्केट में थोड़ी अस्थिरता (volatility) भर दी हो, लेकिन सप्लाई की असल तस्वीर काफी चिंताजनक होती जा रही है। खबरें हैं कि सऊदी अरब ने अपने तेल प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट को बढ़ाने की योजना शुरू कर दी है। यह एक एहतियाती कदम है, अगर अमेरिका ईरान पर कोई कार्रवाई करता है और मध्य पूर्व से सप्लाई बाधित होती है। भले ही इसका मकसद संभावित रुकावटों के दौरान मार्केट को स्थिर रखना हो, लेकिन अगर तनाव कम होता है तो यह ओवरसप्लाई (oversupply) को और बढ़ा सकता है। इसके अलावा, नॉर्थ सी फिजिकल ऑयल मार्केट में आई कमजोरी, जो ब्रेंट फ्यूचर्स (Brent futures) का आधार है, कीमतों में और गिरावट का संकेत दे रही है। अमेरिका में कच्चे तेल की इन्वेंटरी में भारी इजाफा, साथ ही एडजस्टमेंट फिगर्स जैसे डेटा एनोमलीज, मौजूदा प्राइस लेवल की स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं। साल-दर-साल देखें तो, ब्रेंट क्रूड 1.80% और WTI फ्यूचर्स 8.83% गिर चुके हैं, जो इन मौजूदा घटनाओं से पहले ही कीमतों में व्यापक कमजोरी का संकेत देते हैं।
आगे क्या हो सकता है (Future Outlook)
Oil prices का नियर-टर्म डायरेक्शन (near-term direction) अमेरिका-ईरान कूटनीति के नतीजों पर निर्भर करेगा। अगर एक सफल समझौता होता है, तो जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम कम होगा और सप्लाई-साइड के फंडामेंटल्स कीमतों को तय करेंगे। ऐसे में, मार्केट OPEC+ की मीटिंग पर बारीकी से नजर रखेगा, जहां अप्रैल के लिए करीब 1.37 लाख बैरल प्रति दिन की मामूली प्रोडक्शन बढ़ोतरी पर विचार किया जा रहा है। इस ग्रुप का प्रोडक्शन को धीरे-धीरे और लचीले ढंग से एडजस्ट करने का इतिहास रहा है, लेकिन सऊदी अरब और रूस जैसे देशों से सप्लाई बढ़ाने का दबाव बढ़ रहा है। दूसरी ओर, अगर बातचीत फेल होती है, तो सप्लाई में रुकावट का डर फिर से बढ़ सकता है, जिससे कीमतें ऊपर जा सकती हैं। हालांकि, घरेलू इन्वेंटरी में लगातार हो रही बढ़ोतरी किसी भी बड़ी तेजी को सीमित कर सकती है। एनालिस्ट्स का मानना है कि सीमित स्तर की झड़पें कीमतों में थोड़ी देर के लिए उछाल ला सकती हैं, लेकिन लंबा टकराव एक बड़ा वाइल्डकार्ड (wildcard) बना हुआ है।
