पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने स्टेट-रन एनर्जी कंपनियों के रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) को सेंट्रलाइज करने का प्रस्ताव दिया है। सरकार 'Centre for High Technology' को एक हब के रूप में इस्तेमाल कर प्रोजेक्ट्स की डुप्लीकेशन को रोकना चाहती है।
पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने सरकारी ऊर्जा कंपनियों के रिसर्च और डेवलपमेंट कामकाज की निगरानी के लिए एक नए ढांचे का प्रस्ताव पेश किया है। इस योजना के तहत, 'Centre for High Technology' (CHT) को 'Central R&D Coordination Mechanism' (CRCM) के रूप में फिर से तैयार किया जाएगा। यह नई बॉडी प्रोजेक्ट एलोकेशन, फंडिंग और परफॉर्मेंस मॉनिटरिंग की मुख्य देखरेख करेगी, जो पब्लिक सेक्टर की इन कंपनियों के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकता है।
इस बदलाव के पीछे का मकसद
वर्तमान में, सरकारी फर्में अपनी रिसर्च यूनिट्स को स्वतंत्र रूप से मैनेज करती हैं। मंत्रालय का मानना है कि इससे संसाधनों का दोहराव होता है। अब सभी नए रिसर्च प्रस्ताव CRCM के जरिए आएंगे, ताकि सरकारी बजट का बेहतर इस्तेमाल हो सके और इनोवेशन सीधे नेशनल एनर्जी प्रायोरिटीज से जुड़ा रहे।
ऑटोनॉमी पर उठ रहे सवाल
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि हालांकि यह कदम संसाधनों के बंटवारे में सुधार ला सकता है, लेकिन इससे कंपनियों के इन-हाउस रिसर्च डिपार्टमेंट्स की फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित हो सकती है। CRCM के आने से फैसला लेने की प्रक्रिया ऊपर से नीचे (Top-down) हो जाएगी, जिससे इंटरनल कॉम्पिटिशन और इनोवेशन की रफ्तार धीमी होने का डर बना हुआ है।
काम का बंटवारा
नई पॉलिसी के मुताबिक, रिसर्च का दायरा तय किया जाएगा:
- सरकारी फर्में: फ्यूल ग्रेड्स और एनर्जी एफिशिएंसी पर ध्यान देंगी।
- प्राइवेट सेक्टर: प्रोसेस टेक्नोलॉजी और कैटलिस्ट जैसे स्पेशलाइज्ड क्षेत्रों का नेतृत्व करेगा।
- सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कार्बन कैप्चर और कॉम्प्रैस्ड बायोगैस जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम करेंगे।
निवेशकों के नजरिए से देखें तो, सरकारी ऊर्जा कंपनियां जो तकनीकी रिसर्च में भारी पैसा लगाती हैं, उन्हें अब एक नए गवर्नेंस स्ट्रक्चर के तहत काम करना होगा। बाजार की नजर इस बात पर है कि सरकार कंपनियों की फुर्ती (Agility) और सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल के बीच संतुलन कैसे बिठाती है।
