दुनिया भर में ऑफशोर विंड एनर्जी की क्षमता 2035 तक चार गुना होने वाली है, लेकिन ग्रिड और फाइनेंस की दिक्कतों के चलते 25 GW के अप्रूव्ड प्रोजेक्ट्स फिलहाल अटके हुए हैं। जानिए इसका एनर्जी सेक्टर और निवेशकों पर क्या असर होगा।
क्या हुआ?
दुनिया भर में ऑफशोर विंड सेक्टर एक बड़ी तेजी के लिए तैयार है। साल 2035 तक इसकी क्षमता 92.5 GW (2025 के अंत तक) से बढ़कर 420 GW होने का अनुमान है। ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, अगले दशक में इंडस्ट्री 327 GW नई क्षमता जोड़ने की उम्मीद कर रही है।
लेकिन, इस ग्रोथ की राह में एक बड़ा रोड़ा आ गया है। लगभग 25 GW के ऐसे ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट्स, जिन्हें पहले ही प्लानिंग की मंजूरी मिल चुकी थी, वे फिलहाल रुके हुए हैं। ये प्रोजेक्ट ग्रिड कनेक्टिविटी की दिक्कतें, ऑक्शन में देरी और जरूरी फाइनेंस जुटाने में परेशानी जैसी वजहों से अटके पड़े हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
निवेशकों के लिए, भारी मांग के अनुमान और रुके हुए प्रोजेक्ट्स की हकीकत के बीच का अंतर बहुत मायने रखता है। ऑफशोर विंड का लॉन्ग-टर्म आउटलुक एनर्जी सिक्योरिटी और क्लीन पावर की वजह से मजबूत बना हुआ है, लेकिन प्रोजेक्ट्स में देरी का डेवलपर्स और सप्लायर्स की फाइनेंशियल हेल्थ पर सीधा असर पड़ता है।
जब कोई प्रोजेक्ट लेट होता है, तो उसमें लगा पैसा ब्लॉक हो जाता है, इंटरेस्ट कॉस्ट बढ़ जाती है और रेवेन्यू आने की टाइमलाइन आगे खिसक जाती है। इस सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों के लिए, ऐसे 'स्ट्रैंडेड' प्रोजेक्ट्स का मतलब है कि उनके निवेश पर रिटर्न मिलने में ज्यादा समय लगेगा, जो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
ग्रिड और एग्जीक्यूशन की चुनौती
पहचानी गई सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। विंड फार्म बनाना तो आधा काम है; इसके बाद पावर को ग्रिड तक कुशलता से पहुंचाना होता है। कई जगहों पर, ग्रिड आज की एनर्जी को संभालने के लिए तैयार नहीं है। यह एक ऐसी बाधा है जिसे सरकारें और यूटिलिटीज सुलझाने की कोशिश कर रही हैं।
इसके अलावा, इंडस्ट्री सप्लाई चेन पर पड़ रहे दबाव से भी जूझ रही है। टर्बाइन का साइज बढ़ने के साथ (जो अब औसतन 10 मेगावाट से ऊपर हैं), इन बड़े कंपोनेंट्स को बनाने, ट्रांसपोर्ट करने और इंस्टॉल करने की लॉजिस्टिकल कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ गई है। इससे इन प्रोजेक्ट्स में शामिल इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन फर्मों के लिए लागत बढ़ने और एग्जीक्यूशन में देरी का खतरा बढ़ गया है।
भारतीय संदर्भ को समझना
भले ही चीन और यूरोप ऑफशोर विंड मार्केट में आगे हैं, भारत भी अपनी एनर्जी ट्रांज़िशन स्ट्रेटेजी के एक अहम हिस्से के तौर पर ऑफशोर विंड की ओर देख रहा है। भारतीय निवेशकों के लिए, ग्लोबल 'रुके हुए प्रोजेक्ट्स' का ट्रेंड एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है।
वैश्विक स्तर पर पहचानी गई चुनौतियां - जैसे लॉन्ग-टर्म पॉलिसी की निश्चितता, भरोसेमंद ग्रिड कनेक्टिविटी और स्टेबल फाइनेंसिंग फ्रेमवर्क की जरूरत - वही फैक्टर हैं जो भारत की अपनी ऑफशोर विंड पहलों की सफलता तय करेंगे। अगर स्थापित बाजारों में प्रोजेक्ट्स इन दिक्कतों से जूझ रहे हैं, तो भारत जैसे नए बाजारों के लिए, जहां ऑफशोर पावर के लिए सप्लाई चेन और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर अभी विकसित हो रहा है, वहां जोखिम ज्यादा बना हुआ है।
जोखिम और चिंताएं
निवेशकों को इस सेक्टर में मौजूद खास बिजनेस रिस्क के बारे में पता होना चाहिए। पहला, पॉलिसी अनिश्चितता का खतरा है। ऑफशोर विंड में बड़ी शुरुआती पूंजी की जरूरत होती है, और डेवलपर्स को कमिटमेंट करने के लिए स्पष्ट, लॉन्ग-टर्म सरकारी सपोर्ट की जरूरत होती है। अगर ऑक्शन फ्रेमवर्क या सब्सिडी नियम बदलते हैं, तो प्रोजेक्ट्स जल्दी ही अव्यवहारिक हो सकते हैं।
दूसरा, फाइनेंसिंग का जोखिम है। बढ़ी हुई ब्याज दरें और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें प्रोजेक्ट्स को प्लान से ज्यादा महंगा बना सकती हैं, जिससे डेवलपर्स की प्रॉफिटेबिलिटी कम हो सकती है। अंत में, परमिटिंग की धीमी रफ्तार एक लगातार बनी हुई समस्या है, जहां नौकरशाही की देरी प्रोजेक्ट की टाइमलाइन में सालों का इजाफा कर सकती है, जिससे प्रोजेक्ट के समय के साथ कम प्रतिस्पर्धी होने का जोखिम बढ़ जाता है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे बढ़ते हुए, इस सेक्टर के लिए सबसे अहम बात पॉलिसी एक्शन की रफ्तार होगी। निवेशक यह ट्रैक कर सकते हैं कि क्या सरकारें ऑफशोर विंड और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे पोर्ट और ग्रिड स्टोरेज) को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर नामित करती हैं। इस तरह के पदनाम से अक्सर परमिट प्रोसेस तेज होता है और फाइनेंसिंग की लागत कम होती है।
इसके अलावा, इंडस्ट्री पार्टनरशिप और सप्लाई चेन की स्थिरता पर भी नजर रखें। अंततः, सेक्टर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या डेवलपर्स प्लानिंग और एक्चुअल कंस्ट्रक्शन के बीच के अंतर को पाट सकते हैं, और इन 25 GW की संभावित ऊर्जा को ऑपरेशनल एसेट्स में बदल सकते हैं।
