ग्लोबल मार्केट में जारी अस्थिरता के बीच OPEC+ ने कच्चे तेल के प्रोडक्शन को नवंबर 2026 तक स्थिर रखने का फैसला किया है। ईरान युद्ध के कारण उपजे तनाव के चलते ग्रुप ने अपनी 2027 की क्षमता समीक्षा को टाल दिया है, जो भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
बाजार में स्थिरता की कोशिश
OPEC+ एलायंस ने साफ कर दिया है कि वे नवंबर 2026 तक अपने प्रोडक्शन टारगेट्स में कोई बदलाव नहीं करेंगे। सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, कजाकिस्तान और ओमान जैसे प्रमुख देशों ने 4 अक्टूबर की औपचारिक बैठक से पहले ही इस पर सहमति बना ली थी। इस फैसले का मुख्य मकसद ग्लोबल मार्केट में बढ़ती अनिश्चितता के बीच बाजार को संभलने का मौका देना है।
ईरान युद्ध और सप्लाई का संकट
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह ईरान में चल रहा संघर्ष है, जिसने ऊर्जा सप्लाई को लेकर भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। हालात इतने नाजुक हैं कि ग्रुप ने अपनी 2027 की क्षमता समीक्षा को भी सितंबर से टालकर अब मिड-नवंबर तक कर दिया है।
असल स्थिति और डेटा
आंकड़ों पर गौर करें तो हकीकत काफी अलग है। ईरान संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर की तुलना में कोर मेंबर्स का प्रोडक्शन 50 लाख बैरल प्रति दिन कम है। इसके अलावा, 20 लाख बैरल प्रति दिन की स्वैच्छिक कटौती (voluntary cuts) भी 2026 के अंत तक लागू रहेगी। यानी बाजार पहले ही सीमित सप्लाई के साथ चल रहा है।
भारत के लिए चुनौतियां
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक भारत के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम रास्तों से सप्लाई प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है। इससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और घरेलू महंगाई पर भी दबाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल बाजार की नजर अब नवंबर में होने वाली अगली समीक्षा पर टिकी है।
