ONGC के चेयरमैन अरुण कुमार सिंह ने बड़ा ऐलान किया है। अब भारत का **60%** से ज्यादा कच्चा तेल (Crude) लंबी अवधि के फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट्स के बजाय स्पॉट मार्केट की कीमतों पर खरीदा जाएगा। कंपनी अपनी प्राइसिंग में लचीलापन ला रही है ताकि ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव को बेहतर तरीके से हैंडल किया जा सके।
बाजार के बदलाव को समझने की तैयारी
ONGC अब अपनी क्रूड इंपोर्ट स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव कर रहा है। चेयरमैन और सीईओ अरुण कुमार सिंह के मुताबिक, अब देश का 60% से ज्यादा कच्चा तेल मंथली या M+2 मार्केट साइकिल के हिसाब से खरीदा जा रहा है। इस 'कार्गो-टू-कार्गो' इवैल्यूएशन से रिफाइनर्स को ग्लोबल मार्केट में कीमतों के भारी उतार-चढ़ाव के बीच बेहतर तालमेल बिठाने में मदद मिलेगी।
इंटीग्रेटेड बिजनेस मॉडल से रिस्क मैनेजमेंट
निवेशकों के लिए ONGC की मजबूती को समझना जरूरी है। कंपनी का बिजनेस मॉडल 60-40 के अनुपात में बंटा है, जिसमें एक तरफ एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन (E&P) है और दूसरी तरफ रिफाइनिंग का काम। यह मॉडल नेचुरल हेजिंग की तरह काम करता है। जब ग्लोबल ऑयल की कीमतें गिरती हैं, तो रिफाइनिंग बिजनेस से मुनाफा मिलता है और जब कीमतें बढ़ती हैं, तो एक्सप्लोरेशन सेगमेंट फायदा उठाता है। यह सेटअप $60 से $90 प्रति बैरल के बीच क्रूड प्राइस होने पर कंपनी की बैलेंस शीट को सुरक्षित रखता है।
₹1 लाख करोड़ का भविष्य का विजन
कंपनी ने लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए कमर कस ली है। अगले 5 सालों में डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन में ₹1 लाख करोड़ का निवेश करने की योजना है। इसके तहत FY31 तक 87 कुओं की ड्रिलिंग का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, 2026 के अंत तक दुबई या सिंगापुर में ग्लोबल ट्रेडिंग डेस्क खोलने की तैयारी है, जो क्रूड और गैस ट्रेडिंग को मॉडर्न बनाएगी।
क्या है रिस्क?
कंपनी ने पहली तिमाही में ₹17,034 करोड़ का दमदार स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट दर्ज किया है, लेकिन कंसोलिडेटेड प्रॉफिट्स पर रिफाइनिंग सब्सिडियरीज में हो रहे घाटे का असर दिख रहा है। इसके अलावा, पुराने ऑयल फील्ड्स में उत्पादन में आ रही गिरावट भी एक चुनौती है। निवेशकों को नए डिस्कवरीज की सफलता और मैंगलोर में 1.75 मिलियन मीट्रिक टन के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व पर नजर रखनी चाहिए।
