दुनिया भर में तेल की सप्लाई में एक बड़ी स्ट्रक्चरल इम्बैलेंस (structural imbalance) देखने को मिल रही है। सालों से इस सेक्टर में पर्याप्त निवेश (investment) न होने और पेट्रोकेमिकल्स (petrochemicals) व उभरती अर्थव्यवस्थाओं (emerging economies) से लगातार बढ़ती मांग के कारण ऐसा हुआ है। ऐसे में भारत की Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) जैसी अपस्ट्रीम एनर्जी प्रोड्यूसर्स (upstream energy producers) के लिए यह एक बड़ा अवसर है।
2050 तक, खासकर पेट्रोकेमिकल्स और डेवलपिंग देशों से, तेल की मांग में बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान है। हालांकि, नए तेल भंडारों की खोज (exploration) में निवेश कम हो गया है, और फोकस मौजूदा प्रोडक्शन लेवल को बनाए रखने पर है। इस सप्लाई गैप को भरने के लिए 2045 तक करीब $12 ट्रिलियन के निवेश की जरूरत बताई जा रही है। ONGC इस चुनौती से निपटने के लिए डीप और अल्ट्रा-डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन (deep and ultra-deep water exploration) जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। साथ ही, मुंबई हाई फील्ड (Mumbai High field) से प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए एक पार्टनरशिप भी की गई है, जिससे उत्पादन में करीब 44% की बढ़ोतरी हो सकती है।
ONGC का मौजूदा प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 9.4x है, जो इसके 10 साल के मीडियन 7.3x से थोड़ा ऊपर है। इसके बावजूद, यह भारतीय ऑयल और गैस इंडस्ट्री के एवरेज 18.6x से काफी कम है, और पीयर्स (peers) के एवरेज 6.6x से भी नीचे है। निवेशकों को ONGC की 4.3% की डिविडेंड यील्ड (dividend yield) भी आकर्षित कर रही है, जो आय का एक स्थिर स्रोत है और कुछ हद तक डाउनसाइड प्रोटेक्शन (downside protection) भी देती है। पिछले एक साल में स्टॉक में करीब 14.77% की बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि निफ्टी सेंसेक्स (Sensex) में गिरावट आई थी।
ग्लोबल ऑयल मार्केट की फेवरेबल कंडीशन (favorable condition) को देखते हुए, एनालिस्ट्स (analysts) का ONGC पर मिला-जुला रुख है। ज्यादातर एनालिस्ट 'बाय' (Buy) या 'आउटपरफॉर्म' (Outperform) की सलाह दे रहे हैं, जिनके 12-महीने के प्राइस टारगेट ₹275 से ₹305 तक हैं, जो 6% से 15% तक का अपसाइड पोटेंशियल (upside potential) दिखाते हैं। एनालिस्ट्स की मुख्य नजर ONGC की प्रोडक्शन ग्रोथ (production growth) को लगातार बढ़ाने की क्षमता पर है। हाल ही में डीप-वॉटर KG-DWN-98/2 ब्लॉक से उत्पादन शुरू करने जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन वैल्यूएशन को सपोर्ट करने के लिए आउटपुट को पर्याप्त रूप से बढ़ाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुछ ब्रोकरेज हाउसेज (brokerages) ने प्रोडक्शन आउटलुक (production outlook) को लेकर कम उम्मीदों के चलते अपने प्राइस टारगेट कम भी किए हैं।
ONGC के सामने कई रिस्क (risks) भी हैं। जटिल और लंबी अवधि की एक्सप्लोरेशन और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स (exploration and development projects) को सफलतापूर्वक पूरा करना एक चुनौती है। एक सरकारी कंपनी (PSU) होने के नाते, इसे पॉलिसी इंटरवेंशन (policy interventions) का सामना भी करना पड़ सकता है, जो प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले इसके वैल्यूएशन को प्रभावित कर सकता है। कंपनी का डेट-टू-इक्विटी (debt-to-equity) रेश्यो करीब 0.03 है, जो वित्तीय स्थिरता (financial stability) को दर्शाता है। हालांकि, पिछले साल के मुकाबले कमाई (earnings) में गिरावट आई है, और कंपनी वोलेटाइल क्रूड ऑयल प्राइस (volatile crude oil prices) के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। नए सीएफओ (CFO) की नियुक्ति का ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) पर असर देखा जाएगा। कुल मिलाकर, ONGC एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ बाजार का बड़ा अवसर भी है और ऑपरेशनल बाधाएं भी। कंपनी का भविष्य काफी हद तक महत्वाकांक्षी ग्रोथ प्लान्स (growth plans) को एग्जीक्यूट (execute) करने और प्रोडक्शन में सार्थक बढ़ोतरी हासिल करने पर निर्भर करेगा, न कि सिर्फ कमोडिटी प्राइस (commodity price) के उतार-चढ़ाव पर।
