E85 फ्यूल एक्सपेंशन पर लगा ब्रेक: कम मांग और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की कमी बनी वजह

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AuthorAditya Rao|Published at:
E85 फ्यूल एक्सपेंशन पर लगा ब्रेक: कम मांग और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की कमी बनी वजह

भारत में ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) अब E85 फ्यूल स्टेशनों का विस्तार धीमी गति से कर रही हैं। इसकी मुख्य वजह ग्राहकों की ओर से कम मांग और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों (Flex-Fuel Vehicles) की कमी है। यह कदम देश के इथेनॉल-ब्लेंडिंग (Ethanol-Blending) रोडमैप में आ रही चुनौतियों को दिखाता है।

इथेनॉल रोडमैप में आ रही हैं दिक्कतें

ज्यादा इथेनॉल वाले ईंधन की ओर बढ़ना इस बात पर निर्भर करता है कि ऐसी कितनी गाड़ियां मौजूद हैं जो इन ईंधनों का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों (FFVs) की कमी के चलते E100 (100% इथेनॉल) का पायलट प्रोग्राम ज्यादा कारगर साबित नहीं हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 400 रिटेल आउटलेट्स पर E100 की टेस्टिंग के बाद, इसकी मांग न के बराबर पाई गई। इसके चलते OMCs ने एक्टिव पायलट पंपों की संख्या घटाकर 10 से भी कम कर दी है। साथ ही, E25 (25% इथेनॉल) की लॉन्चिंग में भी देरी हो रही है, क्योंकि कंपनियां इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कहीं पुराने मॉडलों की गाड़ियों के इंजन को नुकसान न पहुंचे, जो खासतौर पर ज्यादा इथेनॉल के लिए नहीं बने थे।

क्यों रुका हुआ है एक्सपेंशन?

OMCs के लिए नई इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने के लिए प्रॉफिट (profit) का रास्ता साफ होना और पर्याप्त वॉल्यूम (volume) का होना जरूरी है। मौजूदा डेटा बताता है कि E85 (जिसमें 85% इथेनॉल होता है) को बढ़ावा देना फिलहाल जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके लिए जरूरी गाड़ियों की संख्या अभी काफी कम है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि रिटेलर्स (retailers) डिस्पेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (dispensing infrastructure) को बढ़ाने में हिचकिचा रहे हैं, क्योंकि यह निश्चित नहीं है कि इसके लिए गाड़ियां उपलब्ध होंगी या नहीं। सरकार का लक्ष्य 2026 के अंत तक 500 आउटलेट्स तक पहुंचना है, लेकिन फिलहाल लगभग 48 फंक्शनल E85 आउटलेट्स की संख्या इन कंपनियों के सतर्क रवैये को दर्शाती है।

कीमत और एफिशिएंसी (Efficiency) का गैप

इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा, ग्राहकों के लिए आर्थिक फायदा भी एक बड़ी रुकावट है। हालांकि दिल्ली में E85 की कीमत ₹82.12 प्रति लीटर है, जबकि सामान्य पेट्रोल ₹102.12 प्रति लीटर है, लेकिन असल में यूजर के लिए यह सस्ता नहीं पड़ता। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में एनर्जी डेंसिटी (energy density) कम होती है, जिसका मतलब है कि समान दूरी तय करने के लिए गाड़ी को ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ती है। इस वजह से इथेनॉल-ब्लेंडेड ईंधन का असली खर्च अनुमानित 15% से 25% तक बढ़ जाता है।

एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि इथेनॉल को एक बेहतर विकल्प बनाने के लिए, इसकी प्रोडक्शन कॉस्ट (production cost) लगभग ₹52-63 प्रति लीटर तक गिरनी चाहिए। मौजूदा कीमतों पर, आम ग्राहक के लिए पारंपरिक पेट्रोल के बजाय ज्यादा इथेनॉल वाले ब्लेंड्स को चुनना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। निवेशकों को सरकारी सब्सिडी (subsidy), इथेनॉल प्रोडक्शन कॉस्ट में होने वाले बदलावों और ऑटोमोबाइल कंपनियों द्वारा लॉन्च की जाने वाली नई फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही कारक इथेनॉल इंफ्रास्ट्रक्चर के किसी भी नए विस्तार की समय-सीमा तय करेंगे।

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