देश की सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर संकट के बादल छाए हैं। पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहने और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण कंपनियों को रोजाना **₹530 करोड़** का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
भारी नुकसान का गणित
Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी दिग्गज कंपनियों पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारी दबाव है। जब भारतीय क्रूड बास्केट $117.4 प्रति बैरल के स्तर पर हो, तो रिटेल कीमतों को स्थिर रखना कंपनियों की बैलेंस शीट बिगाड़ रहा है। वर्तमान में, कंपनियों को पेट्रोल पर ₹8 प्रति लीटर और डीजल पर ₹9 प्रति लीटर का नेगेटिव मार्जिन झेलना पड़ रहा है, जिसे मार्केट में 'अंडर-रिकवरी' कहा जाता है।
रिफाइनिंग मार्जिन से भी नहीं मिल रही राहत
हालांकि, सिंगापुर GRMs (Gross Refining Margins) $10 प्रति बैरल से ऊपर बने हुए हैं, जो कुछ राहत जरूर दे रहे हैं, लेकिन यह मार्केटिंग सेगमेंट के नुकसान की भरपाई के लिए नाकाफी हैं। संकट और गहरा तब हो जाता है जब हम LPG सिलेंडर की बात करते हैं। जून के अंत तक LPG पर कुल अंडर-रिकवरी ₹61,940 करोड़ तक पहुंच चुकी है, जहां प्रति सिलेंडर ₹300 का नुकसान हो रहा है।
कर्ज पर बढ़ती निर्भरता
अपनी डेली ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने के लिए ओएमसी कंपनियां अब शॉर्ट-टर्म डेट (कर्ज) का सहारा ले रही हैं। यह उधारी कामकाजी पूंजी (working capital) को तो बनाए रख रही है, लेकिन इसके चलते कंपनियों पर ब्याज का बोझ बढ़ रहा है। बढ़ता कर्ज भविष्य के डिविडेंड और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए चिंता का विषय बन सकता है। अब निवेशकों की नजर सरकार के अगले कदम पर है—क्या सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती करेगी या फ्यूल प्राइसेज को बाजार के हिसाब से एडजस्ट करने की अनुमति देगी?
