ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें **$100** प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जिससे भारतीय Oil Marketing Companies (OMC) की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव न होने के कारण इन कंपनियों के मुनाफे और अंडर-रिकवरी (under-recoveries) का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
मुनाफे पर क्यों है तलवार?
दुनियाभर में भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) के चलते कच्चे तेल के दाम $97 प्रति बैरल (सितंबर 2026 तक) के करीब ट्रेड कर रहे हैं। चूंकि भारत अपनी 85-90% तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए इंपोर्ट बिल का सीधा असर सरकारी कंपनियों पर पड़ रहा है।
मार्जिन का गणित
फिलहाल स्थिति यह है कि कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर का मार्जिन मिल रहा है, लेकिन डीजल की बिक्री पर उन्हें ₹15 प्रति लीटर का नुकसान (negative margin) उठाना पड़ रहा है। रिफाइनिंग ऑपरेशन के जरिए कंपनियां अपने घाटे को संभालने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन कच्चे तेल की ये ऊँची कीमतें लंबे समय तक जारी रहीं, तो बैलेंस शीट पर असर पड़ना तय है।
LPG का बड़ा बोझ
कंपनी के फाइनेंशियल हेल्थ के लिए LPG सेक्टर बड़ी चुनौती बना हुआ है। जुलाई 2026 तक संचयी अंडर-रिकवरी (cumulative under-recoveries) ₹59,000 करोड़ के पार पहुंच गई है। सरकार से मिलने वाली मदद के बावजूद, बाजार भाव और रिटेल रेट के बीच का बड़ा अंतर इन कंपनियों के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
सेक्टर का हाल: Upstream बनाम Downstream
एनर्जी सेक्टर में एक स्पष्ट विभाजन देखने को मिल रहा है। जहाँ ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां कच्चे तेल के ऊंचे दामों से मुनाफा कमाती हैं, वहीं Indian Oil, BPCL और HPCL जैसी डाउनस्ट्रीम कंपनियां पिस रही हैं। जब ये कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, तो उनकी प्रॉफिटेबिलिटी सीधे तौर पर गिर जाती है।
निवेशकों के लिए अब अहम यह है कि वे सरकार के रिटेल प्राइसिंग पॉलिसी पर नजर रखें। यदि तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहती हैं, तो क्या सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव की इजाजत देगी या कंपनियों को अपना मार्जिन और घटाना पड़ेगा, यही भविष्य की चाल तय करेगा।
