Indian Newsprint Manufacturers’ Association ने Coal India से मिल रहे कोयले में भारी देरी को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का दरवाजा खटखटाया है। ऊर्जा की बढ़ती लागत और सप्लाई चेन में बाधाओं के चलते अब उत्पादन में कटौती का खतरा मंडरा रहा है।
कोयला संकट की असल वजह
Indian Newsprint Manufacturers’ Association (INMA) ने अपनी शिकायत में कहा है कि Coal India Ltd की सहायक कंपनियां अपने 'फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट' को पूरा करने में विफल रही हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के कुल कोयला भंडार का करीब 95% हिस्सा अभी पावर सेक्टर (बिजली क्षेत्र) को दिया जा रहा है। इसका सीधा असर नॉन-रेगुलेटेड सेक्टर की कंपनियों पर पड़ा है, जिन्हें अपना प्लांट चलाने के लिए ईंधन नहीं मिल पा रहा है। एसोसिएशन अब पुरानी 75:25 की एलोकेशन रेश्यो को फिर से लागू करने की मांग कर रही है, ताकि पावर और नॉन-पावर सेक्टर के बीच कोयले का वितरण संतुलित हो सके।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
इस आपूर्ति संकट का असर कंपनियों की फाइनेंशियल हेल्थ पर दिखना शुरू हो गया है। अनुबंध के मुताबिक कोयला न मिलने के कारण कंपनियां अब ओपन मार्केट से महंगा कोयला खरीदने या ग्रिड पावर पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। चूंकि यह इंडस्ट्री बहुत कम मार्जिन पर काम करती है, इसलिए बिजली की बढ़ती लागत से कंपनियों के नेट प्रॉफिट और कैश फ्लो पर सीधा दबाव पड़ रहा है।
इसके अलावा, कोयले की अनिश्चित डिलीवरी के कारण फैक्ट्री मैनेजर्स के लिए इन्वेंटरी मैनेजमेंट और स्टेबल प्रोडक्शन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। INMA ने चेतावनी दी है कि अगर तुरंत सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो कई यूनिट्स में प्रोडक्शन पूरी तरह बंद करना पड़ सकता है, जिसका असर बड़े नेशनल प्रिंट मीडिया हाउसों की सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
आगे क्या होगा?
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या सरकार कोयला वितरण नीति में कोई बदलाव करती है। विशेष रूप से Northern Coalfields, Central Coalfields, South Eastern Coalfields और Western Coalfields जैसी सहायक कंपनियों की तरफ से कोयले की सप्लाई में सुधार होना बहुत जरूरी है। आने वाले समय में इन कंपनियों के तिमाही नतीजे बताएंगे कि इस ऊर्जा संकट का उनकी बैलेंस शीट पर कितना गहरा असर पड़ा है।
