सरकार ने **2026-27** के लिए गन्ने से बनने वाले इथेनॉल पर पाबंदी लगाई है, जिससे Oil Marketing Companies (OMCs) की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। अब कंपनियों को महंगे मक्के का सहारा लेना पड़ेगा, जिससे प्रोक्योरमेंट कॉस्ट **₹68.86** प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
सरकार के इस फैसले का असर सीधे तौर पर सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) के फाइनेंशियल मार्जिन पर पड़ेगा। अब तक गन्ने से बने सस्ते फीडस्टॉक का इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन 2026-27 के लिए नए नियमों के बाद अब Bharat Petroleum जैसी कंपनियों को मक्के (maize) जैसे विकल्पों की तरफ रुख करना होगा। इस बदलाव के कारण इथेनॉल की खरीद लागत ₹60.73 से बढ़कर ₹68.86 प्रति लीटर हो सकती है, जो कि 13.4% की बड़ी बढ़ोतरी है।
ईंधन लागत पर असर
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, हर 100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद पर कंपनियों को ₹813 करोड़ का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। OMCs के लिए यह चुनौती है कि यदि वे बढ़ती लागत को ग्राहकों पर नहीं डालती हैं, तो उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर काफी दबाव पड़ेगा। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इसमें कोई प्राइस एडजस्टमेंट करती है।
सप्लाई की दिक्कतें और इंडस्ट्री का रुख
ICRA के अनुसार, 2027 में चीनी का उत्पादन 27-28 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो घरेलू मांग (28.3 मिलियन टन) से कम है। इस कमी को दूर करने के लिए सरकार ने चीनी के डायवर्जन पर रोक लगाई है। हालांकि, भारतीय चीनी मिलों ने डिस्टिलरी क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है, जिससे अब वे काफी परेशान हैं। ISMA ने भी C-heavy मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल के लिए प्राइस रिवीजन की मांग की है ताकि इस बढ़ते कॉस्ट गैप को भरा जा सके।
कुल मिलाकर, भारत का महत्वाकांक्षी E20 फ्यूल ब्लेंडिंग प्रोग्राम अब एक नाजुक मोड़ पर है। यदि इथेनॉल की सप्लाई सस्ती और निरंतर नहीं रही, तो इसका असर सीधे तौर पर देश के क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल पर पड़ेगा।
