2025 के SHANTI Act के तहत नए ड्राफ्ट रेगुलेशंस ने विदेशी न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए कड़ी शर्तें लागू कर दी हैं। इन नियमों के कारण नई टेक्नोलॉजी के भारत आने पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और **100 GW** के लक्ष्य को हासिल करने में देरी हो सकती है।
भारत ने 2047 तक अपनी न्यूक्लियर एनर्जी कैपेसिटी को 100 GW तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। हालांकि, अगस्त 2026 में जारी नए ड्राफ्ट नियमों ने इंडस्ट्री में हलचल पैदा कर दी है।
नई शर्तों से टेक्नोलॉजी का 'अकाल'?
नए ड्राफ्ट में एक कड़ा प्रावधान है कि किसी भी विदेशी रिएक्टर डिजाइन को भारत में तभी इस्तेमाल किया जा सकेगा, जब उसने अपने देश या कहीं और सफलतापूर्वक काम किया हो। जानकारों का कहना है कि यह नियम 'स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर' (SMRs) जैसी आधुनिक टेक्नोलॉजी के लिए बाधा बन सकता है, जो अभी वैश्विक स्तर पर शुरुआती दौर में हैं। इसके चलते भारत को पुरानी और 'लेगेसी' डिजाइनों पर ही निर्भर रहना पड़ सकता है।
प्रोजेक्ट टाइमलाइन पर खतरा
पहले न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के मॉडल में साइट और डिजाइन की मंजूरी साथ-साथ चलती थी, लेकिन अब निर्माण कार्य तब तक शुरू नहीं हो सकता जब तक कि रेगुलेटर पूरी डिजाइन को मंजूरी न दे दे। इन मंजूरियों के लिए कोई फिक्स्ड डेडलाइन नहीं है, जिससे प्रोजेक्ट्स के लंबे समय तक लटकने का डर बना हुआ है।
प्राइवेट प्लेयर्स की दुविधा
Tata Power, Adani Power, Reliance Industries और NTPC जैसी दिग्गज कंपनियां इस क्षेत्र में कदम रखने की तैयारी में हैं, लेकिन नियम स्पष्ट न होने से वे सतर्क हैं। ड्राफ्ट में टैरिफ स्ट्रक्चर, मुनाफे की उम्मीद और प्राइवेट ऑपरेटर्स की फाइनेंशियल लायबिलिटी (Liability) पर कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई है। चूंकि सरकार न्यूक्लियर नुकसान की वित्तीय जिम्मेदारी भी प्राइवेट कंपनियों पर डाल रही है, ऐसे में कॉरपोरेट बोर्ड्स फिलहाल निवेश से हिचकिचा रहे हैं।
निवेशकों को अब 4 सितंबर तक होने वाली पब्लिक कंसल्टेशन पर नजर रखनी चाहिए, जो इस नीति की दिशा तय करेगा।
