भारत सरकार बिजली के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है। पावर मिनिस्ट्री 2005 की नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी को अपडेट करने जा रही है, जिसका लक्ष्य 2030 तक प्रति व्यक्ति बिजली की खपत को **2,000 kWh** तक पहुंचाना है। इस नई पॉलिसी में बिजली टैरिफ को महंगाई से जोड़ने और मैन्युफैक्चरिंग व रेलवे जैसे अहम सेक्टर्स को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज से छूट देने का प्रस्ताव है। इससे कंपनियों की वित्तीय सेहत सुधरेगी और इंडस्ट्रीज की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी।
महंगाई से जुड़ेंगे बिजली के दाम!
बिजली मंत्रालय जल्द ही कैबिनेट में नई नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी का ड्राफ्ट पेश करने वाला है। यह 2005 के बाद पहली बार है जब इस पॉलिसी में इतने बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। इस नई पॉलिसी का मुख्य मकसद 2030 तक प्रति व्यक्ति बिजली की खपत को 2,000 kWh तक ले जाना है। इतना ही नहीं, 2047 तक इसे 4,000 kWh से ऊपर पहुंचाने का भी लक्ष्य रखा गया है।
डिसकॉम्स की माली हालत सुधरेगी?
इस पॉलिसी का एक बड़ा लक्ष्य बिजली सेक्टर में वित्तीय स्थिरता लाना है। ड्राफ्ट में सुझाव दिया गया है कि बिजली के टैरिफ को महंगाई दर से जोड़ा जाए। इससे टैरिफ में समय-समय पर अपने आप एडजस्टमेंट हो सकेगा। उम्मीद है कि इससे राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) को अपने खर्चे निकालने में आसानी होगी और कर्ज का बोझ कम होगा। फिक्स्ड कॉस्ट की रिकवरी डिमांड चार्ज के जरिए करने से बिजली कंपनियों के रेवेन्यू में भी स्थिरता आएगी।
इंडस्ट्रीज को बड़ी राहत
भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाने के लिए, सरकार कुछ खास सेक्टर्स को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज से छूट देने पर विचार कर रही है। अगर यह लागू होता है, तो मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे और मेट्रो जैसी इंडस्ट्रीज को इन अतिरिक्त शुल्कों से छूट मिल जाएगी। अभी इंडस्ट्रीज और कमर्शियल यूजर्स को एग्रीकल्चर और डोमेस्टिक कंज्यूमर्स के लिए कम टैरिफ की भरपाई के तौर पर ज्यादा रेट चुकाने पड़ते हैं। इस बोझ के कम होने से मैन्युफैक्चरर्स और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के लॉजिस्टिक्स और ऑपरेटिंग कॉस्ट में कमी आने की उम्मीद है, जिससे इंडस्ट्रीज के विस्तार के लिए बेहतर माहौल बनेगा।
कंपटीशन और इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग
इस ड्राफ्ट पॉलिसी में बड़े कंज्यूमर्स (1 MW या उससे अधिक लोड वाले) के लिए एक ही इलाके में एक से ज्यादा डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी को ऑपरेट करने की इजाजत देने का भी प्रस्ताव है। इससे बिजली वितरण में कंपटीशन बढ़ेगा। हालांकि, राज्यों की बिजली कंपनियों से मिलने वाले विरोध के कारण इसे लागू करने में चुनौतियां आ सकती हैं।
इन एनर्जी गोल्स को पूरा करने के लिए भारी भरकम फंड की जरूरत होगी। अनुमान है कि 2032 तक पावर सेक्टर को करीब ₹50 लाख करोड़ और 2047 तक ₹200 लाख करोड़ की जरूरत पड़ेगी। इस गैप को भरने के लिए, पॉलिसी में NaBFID और NIIF जैसे डेडिकेटेड फाइनेंसिंग प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है।
निवेशकों के लिए अगला कदम कैबिनेट की मंजूरी और राज्य बिजली नियामक आयोगों (SERCs) द्वारा इन नियमों को अपनाना होगा, क्योंकि वही तय करते हैं कि रीजनल लेवल पर टैरिफ क्या होगा। भविष्य में, इस बात पर फोकस रहेगा कि राज्य सरकारें पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसिंग के प्रस्तावों पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं और महंगाई-लिंक्ड टैरिफ एडजस्टमेंट कब लागू होते हैं।
