मुंबई में नए AI डेटा सेंटर्स के कारण बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। इन सेंटर्स की कुल क्षमता **5,000 MW** है, जो शहर की वर्तमान पीक डिमांड **4,700 MW** से भी ज़्यादा है। यह शहरी बिजली ग्रिड पर दबाव डाल रहा है और भविष्य में इन सेंटर्स को रिन्यूएबल एनर्जी हब के पास ले जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहा है।
पावर इंफ्रास्ट्रक्चर पर AI का बढ़ता दबाव
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर्स का तेज़ी से विकास भारत के शहरी पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। CleanMax Enviro Energy Solutions के आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में वर्तमान में डेटा सेंटर्स के लिए बिजली के स्वीकृत समझौते लगभग 5,000 मेगावाट तक पहुंच गए हैं। यह आंकड़ा शहर की मौजूदा पीक पावर डिमांड, जो कि लगभग 4,700 मेगावाट है, से कहीं ज़्यादा है। यह स्थिति प्रोजेक्ट्स के शुरू होने पर ग्रिड की स्थिरता के लिए एक गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
सिर्फ मुंबई ही नहीं, पूरे देश में दबाव
यह समस्या सिर्फ मुंबई तक ही सीमित नहीं है। बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद और चेन्नई जैसे प्रमुख टेक्नोलॉजी हब भी बिजली और पानी जैसे संसाधनों पर इसी तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं। बड़े डेटा सेंटर्स लगातार हाई-इंटेंसिटी कंप्यूटिंग को सपोर्ट करने के लिए चलते हैं, जिससे उनकी ऊर्जा की ज़रूरतें बहुत ज़्यादा होती हैं। इंडस्ट्री की रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अकेला बड़ा डेटा सेंटर 100,000 घरों जितनी बिजली की खपत कर सकता है। जैसे-जैसे AI वर्कलोड बढ़ रहा है, विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन सेंटर्स की बिजली की खपत में 20 से 30 गुना तक की वृद्धि हो सकती है।
भविष्य के लिए बेहतर स्थान का चुनाव
घनी आबादी वाले शहरी केंद्रों में पारंपरिक बिजली ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना एक बड़ी बाधा है। घनी आबादी वाले इलाकों से हाई-वोल्टेज लाइनें बिछाने में ज़मीन अधिग्रहण जैसी जटिल प्रक्रियाएं शामिल हैं। इन जोखिमों को कम करने के लिए, इंडस्ट्री लीडर्स का सुझाव है कि भविष्य में गीगावाट-स्केल वाले डेटा सेंटर्स को रिन्यूएबल एनर्जी हब के करीब स्थापित किया जाना चाहिए। इन बिजली-गहन सुविधाओं को ऊर्जा उत्पादन के स्रोत के करीब ले जाने से शहरी वितरण नेटवर्क पर बोझ कम होगा।
सरकारी योजनाएं और भविष्य की मांग
भारत का सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (Central Electricity Authority) इस औद्योगिक बदलाव को ध्यान में रखते हुए अपनी लॉन्ग-टर्म पावर प्लानिंग को अपडेट कर रहा है। आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, भारत में पीक बिजली की मांग 2026-27 में 289 गीगावाट से बढ़कर 2035-36 तक 459 गीगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। डेटा सेंटर्स अब राष्ट्रीय बिजली की खपत में वृद्धि के प्रमुख कारणों में से एक माने जा रहे हैं। सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है कि भविष्य का इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट इन ज़रूरतों के साथ तालमेल बिठाए। 2035 तक, देश की कुल पावर कैपेसिटी का लगभग 70% नॉन-फॉसिल फ्यूल स्रोतों से आने का लक्ष्य है। इस क्षेत्र पर नज़र रखने वाले निवेशकों को डेटा सेंटर ऑपरेटर्स की साइट सिलेक्शन स्ट्रेटेजी पर ध्यान देना चाहिए और यह देखना चाहिए कि यूटिलिटी प्रोवाइडर्स बढ़ती मांग और उपलब्ध ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच के अंतर को सफलतापूर्वक कैसे पाट पाते हैं।
