पॉलिसी में बड़े बदलाव का असर
दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ भारत सरकार की जुलाई 2025 में आई एक नई पॉलिसी है। सरकार ने कई कोयला आधारित पावर प्लांट्स के लिए Flue Gas Desulphurisation (FGD) सिस्टम लगाने की अनिवार्यता में बड़ी छूट दे दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 78% कोयला पावर प्लांट्स को इससे बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि भारत के कोयले में सल्फर की मात्रा कम है और FGD से सेहत को होने वाले फायदे उतने ज़्यादा नहीं हैं। इस पॉलिसी बदलाव ने Mitsubishi Power India (MPI) जैसी कंपनियों के लिए ऐसे प्रोजेक्ट्स का बाजार काफी छोटा कर दिया है। Farakka प्रोजेक्ट में भी केवल एक तिहाई काम ही पूरा हुआ है।
सेटलमेंट अमाउंट पर तकरार
अब सवाल आता है कि इस प्रोजेक्ट को पूरा न कर पाने के लिए कितनी रकम देनी होगी। NTPC, Mitsubishi Power India Private Limited से इस अधूरे प्रोजेक्ट के लिए ₹1,200 करोड़ से ज़्यादा की मांग कर रहा है। वहीं, जापानी कंपनी ने बातचीत में करीब ₹720 करोड़ के सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया है। यह राशि प्रोजेक्ट में देरी और काम पूरा न होने की देनदारी को निपटाने के लिए है। प्रोजेक्ट पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में है, जो कि ज़्यादा घनी आबादी वाले इलाकों से दूर है, जहाँ FGD अनिवार्य था।
NTPC की मजबूती VS MPI की परेशानियां
National Thermal Power Corporation (NTPC) एक बेहद मजबूत कंपनी है। भारत की सबसे बड़ी एनर्जी कंपनियों में से एक NTPC का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalisation) अप्रैल 2026 तक करीब ₹3.95 लाख करोड़ था। इसका P/E Ratio लगभग 16.11 से 24.83 के बीच रहा है, जिसे अक्सर वैल्यू स्टॉक माना जाता है। एनालिस्ट्स (Analysts) NTPC को 'Strong Buy' की रेटिंग देते हैं और ₹424.88 का 12-महीने का टारगेट प्राइस देते हैं। इसकी वजह है कंपनी का लगातार बढ़ता रेवेन्यू, जो मार्च 2025 में ₹1.88 लाख करोड़ से भी ज़्यादा था।
दूसरी तरफ, Mitsubishi Heavy Industries की सब्सिडियरी Mitsubishi Power India (MPI) भारी वित्तीय समस्याओं से जूझ रही है। पैरेंट कंपनी से अगस्त 2025 में बड़ी मदद मिलने के बावजूद, MPI लगातार नुकसान (Losses) और नेगेटिव नेट एसेट्स (Negative Net Assets) की रिपोर्ट कर रही है। इसका FY25 का रेवेन्यू महज़ ₹298 करोड़ था, जो NTPC की तुलना में काफी कम है। MPI मुख्य रूप से सेल्स और सर्विस पर फोकस करती है।
पावर सेक्टर के खिलाड़ी और मार्केट की चाल
यह विवाद भारत के पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में हो रहे बदलावों के बीच आया है। NTPC अपनी मजबूत फाइनेंसियल पोजीशन के साथ अच्छा कर रही है, जबकि सरकारी कंपनी Bharat Heavy Electricals Ltd (BHEL) को ज़्यादा P/E Ratio (लगभग 150.08) और कम रिटर्न से जूझना पड़ रहा है। Larsen & Toubro (L&T) जैसी बड़ी इंफ्रा कंपनी का P/E Ratio 33.98 है, लेकिन यह कई तरह के प्रोजेक्ट्स पर काम करती है।
FGD नियमों में ढील मिलने से Mitsubishi Power India जैसी कंपनियों के लिए खास तरह की एनवायरनमेंटल सर्विसेज (Environmental Services) की डिमांड कम हो गई है।
काम पूरा करने की चुनौती और सिकुड़ता बाज़ार
MPI का Farakka प्रोजेक्ट से निकलने का इरादा केवल पॉलिसी बदलाव के कारण नहीं है, बल्कि कंपनी की अपनी वित्तीय और ऑपरेशनल कमजोरियों के कारण भी है। लगातार घाटा और नेगेटिव नेट एसेट्स, साथ ही Farakka प्रोजेक्ट में देरी, कंपनी की प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की क्षमता पर सवाल खड़े करते हैं। ऊपर से FGD इंस्टॉलेशन का बाज़ार सिकुड़ता जा रहा है, जिससे उन कंपनियों पर असर पड़ रहा है जो इस पर निर्भर हैं। NTPC जैसी मजबूत कंपनी इस तरह के विवादों को संभाल सकती है, लेकिन यह सप्लायर्स और कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए एक चेतावनी है। MPI को इस विवाद से पेनाल्टी (Penalty) या लंबे कानूनी लड़ाई का सामना भी करना पड़ सकता है।
आगे का नज़ारा
NTPC के लिए, Farakka विवाद एक छोटी सी समस्या है, जो उसके बड़े ऑपरेशंस के बीच मैनेज हो जाएगी। एनालिस्ट्स (Analysts) कंपनी के स्टॉक को लेकर बहुत पॉजिटिव हैं। NTPC भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान दे रही है, और इसकी मजबूत फाइनेंसियल पोजीशन इसे मदद करेगी।
वहीं, Mitsubishi Power India को एक ऐसे मार्केट में अपनी रणनीति बदलनी होगी जहाँ FGD सिस्टम की डिमांड कम है। कंपनी को शायद दूसरी पावर जनरेशन टेक्नोलॉजीज़ या सर्विसेज पर ध्यान देना होगा जहाँ डिमांड ज़्यादा और नियम स्पष्ट हों।
