मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रैट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होने वाली क्रूड शिपमेंट ठप पड़ गई है। नतीजतन, BPCL और IOCL जैसी कंपनियों को मजबूरन महंगे स्पॉट मार्केट से तेल खरीदना पड़ रहा है, जिससे ब्रेंट क्रूड **$95.50** प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
लॉजिस्टिक संकट और बढ़ती लागत
मिडल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव ने भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति की राह कठिन बना दी है। तेल के प्रमुख रूट 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' में लगातार देरी की खबरें हैं। इसकी वजह से भारत की सरकारी रिफाइनरी कंपनियों—BPCL और IOCL—को अपने तय लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स को छोड़कर महंगे स्पॉट मार्केट से क्रूड खरीदना पड़ रहा है, ताकि रिफाइनरियों का कामकाज सुचारू रूप से चलता रहे।
रूसी तेल का घटता फायदा
भारत के लिए मुसीबत सिर्फ मिडल ईस्ट तक सीमित नहीं है। अब तक भारतीय रिफाइनरी कंपनियां रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपना खर्च कम कर रही थीं, लेकिन अगस्त 2026 में रूस से होने वाले भारत के तेल आयात में लगभग 26% की गिरावट आई है। रूस में इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों और चीन की तरफ से बढ़ती डिमांड के कारण रूसी तेल अब डिस्काउंट के बजाय प्रीमियम पर मिल रहा है, जिससे भारतीय कंपनियों को मिलने वाला बड़ा फायदा खत्म हो गया है।
रिफाइनरी मार्जिन पर दबाव
ब्रेंट क्रूड के $95.50 प्रति बैरल तक उछलने से भारत के इंपोर्ट बिल पर भारी दबाव है। ओएमसी (OMCs) के लिए चुनौती यह है कि अगर वे अचानक बढ़ी हुई इनपुट लागत को ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पाती हैं, तो उनके रिफाइनिंग मार्जिन पर सीधे चोट लगेगी।
मार्केट पर असर
तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है। बढ़ती महंगाई की आशंका के बीच Nifty 50 और BSE Sensex में हलचल है, और ओएमसी कंपनियों के शेयरों पर लगातार दबाव बना हुआ है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि यह सप्लाई संकट कब तक चलता है और रिफाइनरी कंपनियां आने वाली तिमाहियों में अपने इन्वेंट्री मैनेजमेंट को कैसे संभालती हैं।
